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08
Aug

सिंचित चावल पारितंत्र

सिंचित चावल पारितंत्र

1. सिंचित चावल पारितंत्र

2. सिंचित चावल पारितंत्र द. एशिया में पाया जाने वाला मुख्य पारितंत्र है।

3. सिंचित चावल पारितंत्र वैश्विक चावल उत्पादन का 75% है।

4. भारत में, चावल का कुल सिंचित क्षेत्र लगभग 2.2करोड़ हे. है जो कुल चावल की खेती के क्षेत्रफल का 49.5% है।

5. इन राज्यों में चावल की खेती सिंचित दशाओं में होती है:

  • पंजाब,
  • हरियाणा,
  • उत्तरप्रदेश,
  • जम्मू और कश्मीर,
  • आन्ध्र प्रदेश,
  • तमिलनाडु,
  • सिक्किम,
  • कर्नाटक,
  • हिमाचल प्रदेश और
  • गुजरात

6. सिंचित चावल की खेती मेड़ वाले चावल के खेतों में की जाती है।

08
Aug

सिंचित चावल पारितंत्र

सिंचित चावल पारितंत्र

1. सिंचित चावल पारितंत्र

2. सिंचित चावल पारितंत्र द. एशिया में पाया जाने वाला मुख्य पारितंत्र है।

3. सिंचित चावल पारितंत्र वैश्विक चावल उत्पादन का 75% है।

4. भारत में, चावल का कुल सिंचित क्षेत्र लगभग 2.2करोड़ हे. है जो कुल चावल की खेती के क्षेत्रफल का 49.5% है।

5. इन राज्यों में चावल की खेती सिंचित दशाओं में होती है:

  • पंजाब,
  • हरियाणा,
  • उत्तरप्रदेश,
  • जम्मू और कश्मीर,
  • आन्ध्र प्रदेश,
  • तमिलनाडु,
  • सिक्किम,
  • कर्नाटक,
  • हिमाचल प्रदेश और
  • गुजरात

6. सिंचित चावल की खेती मेड़ वाले चावल के खेतों में की जाती है।

08
Aug

एस.आर.आइ क्या है

• सिस्टम ऑफ़ राइस इंटेंसिफिकेशन (या चावल की तीव्रीकरण प्रणाली), प्रौद्योगिकी के बजाय एक “प्रणाली” है क्योंकि वह कुछ निश्चित प्रथाओं का समूह नहीं है। • एस.आर.आइ में कुछ विशिष्ट तकनीकें होती हैं जिन्हे हमेशा स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार परीक्षित कर अपनाया जाना चाहिए, बजाय इसके कि सीधे अपना लिया जाए। • इन प्रथाओं के अच्छे इस्तेमाल से, आमतौर पर चावल की उपज को 50 से 100% तक बढाना सम्भव है और जहां उत्पादन का आरम्भिक स्तर निम्न हो वहां 200 से 300% तक की बढत हासिल की गई है। इस प्रकार की बढत किसी किस्म या लागत के उपयोग में बदलाव की आवश्यकता के बगैर हासिल की जा सकती है। एस.आर.आइ में पानी की मात्रा केवल आधी लगती है, जो पानी की भारी बचत को सम्भव बनाती है।

1. एस.आर.आइ सिस्टम ऑफ़ राइस इंटेंसिफिकेशन (या चावल की तीव्रीकरण प्रणाली) का संक्षिप्त नाम है। यह किसी किस्म या संकर को नहीं लेकिन केवल चावल की खेती की एक विशेष बेहतर विधि को दर्शाता है। 2. चावल की खेती की यह बेहतर विधि मूलतः मेडागास्कर में 1983 में विकसित की गई थी और अब पूरे विश्व में चावल उगाने वाले अन्य देशों में फैल रही है। 3. एस.आर.आइ कई प्रथाओं का मेल है जिनमें नर्सरी के प्रबन्ध में बदलाव, प्रत्यारोपण का समय तथा जल, पोषक तत्वों व घास-फूस का प्रबन्धन शामिल हैं। 4. यद्यपि मूलभूत तरीके लगभग बगैर बदलाव के रहते हैं, एस.आर.आइ चावल की परम्परागत खेती में कुछ कृषिगत प्रथाओं में बदलाव पर ज़ोर देती है।

चावल की खेती वाले पारितंत्र

1. चावल की खेती भारत के कई कृषि पारितंत्रों में की जाती है। दुनिया के किसी भी अन्य देश में चावल के इतने विविध पारितंत्र नहीं हैं।

2. चूंकि चावल की खेती इतनी व्यापक है, भारत में चार प्रकार के पारितंत्र विकसित हुए हैं।

भारत के विभिन्न चावल पारितंत्र

भारत में चावल के चार पारितंत्र पाए जाते हैं:

1. सिंचित चावल पारितंत्र

2. वर्षा आधारित उच्चभूमि चावल पारितंत्र

3. वर्षा आधारित निम्नभूमि चावल पारितंत्र

4. बाढ़ वाला चावल पारितंत्र

08
Aug

शुष्क पश्चिमी मैदान

शुष्क पश्चिमी मैदान

शुष्क पश्चिमी मैदान के अंतर्गत आते हैं:

  • हरियाणा
  • राजस्थान
  • गुजरात
  • दादरा और नगर हवेली

मुख्य मृदा-समूह हैं:

  • जलोढ़ मिट्टी
  • लाल-पीली मिट्टी
  • मध्यम से लेकर गहरी काली मिट्टी

सतलज-गंगा का उप-आर्द्र जलोढ़ मैदान

इस क्षेत्र में मई-जून से सितंबर-अक्टूबर तक चावल की एकल फसल उगाई जाती है। जाड़ॆ में तापमान कम रहता है।

सतलज-गंगा के उप-आर्द्र जलोढ़ मैदान में ये राज्य आते हैं:

  • पंजाब
  • उत्तरप्रदेश
  • बिहार
  • दिल्ली

मुख्य मृदा-समूह हैं:  

  • चूनायुक्त जलोढ़ मिट्टी
  • नदीय जलोढ़ मिट्टी
  • खारी और क्षारीय मिट्टी
  • लाल-पीली दुमट मिट्टी
  • मिश्रित लाल और काली मिट्टियां
  • लाल बलुई मिट्टी

अर्ध शुष्क लावा पठार और केन्द्रीय उच्च भूमि

इस क्षेत्र में निम्नलिखित राज्य आते हैं:

  • महाराष्ट्र
  • पश्चिमी और केन्द्रीय मध्य प्रदेश
  • गोवा, दमन और दीव

प्रमुख मृदा समूह:

  • तटीय जलोढ़ मिट्टी
  • मिश्रित लाल और काली मिट्टी  
  • रत्नागिरी जिला, कोल्हापुर के कुछ भाग, कोलाबा का दक्षिणी भाग आदि उच्च वर्षा वाले इलाकों की लैटेराइट मिट्टी में चावल की खेती की जाती है।
  • पश्चिमी मध्य प्रदेश में चम्बल नदी के जलोढ़ निक्षेपों के कारण जलोढ़ मिट्टियों का निर्माण हुआ है।
  • कम मात्रा में नाइट्रोजन और फास्फोरस के साथ ये मिट्टियां उदासीन से लेकर क्षारीय प्रकृति तक की होती हैं।

आर्द्र पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र

इस क्षेत्र के प्रमुख मृदा समूह

1. उप-परवतीय मिट्टी

2. पहाड़ी मिट्टी

3. तराई मिट्टी

आर्द्र पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में निम्नलिखित प्रदेश आते हैं:

1) जम्मू और कश्मीर: जम्मू कश्मीर में पाई जाने वाली चावल उत्पादक मिट्टियां चेनाब, रावी, तवी और उनकी सहायक नदियों द्वारा लाए गए जलोढ़ निक्षेपों से निर्मित हैं जो प्रायः जम्मू और कठुआ जिलों में पाई जती हैं। उप पर्वतीय मिट्टियां घाटी में सिंधु और झेलम नदियों द्वारी लाए गए जलोढ निक्षेपों से बनी हैं। वे गाद युक्त दोमट से लेकर चिकनी दोमट तक और उदासीन से लेकर क्षारीय प्रकृति तक होती हैं।

2) हिमाचल प्रदेश: हिमाचल प्रदेश की मिट्टियां हिमालय क्षेत्र की मूल चट्टानों, जैसे- बलुआपत्थर, धूसर अभ्रक युक्त बलुआपत्थर और शेल निर्मित होती हैं। ये मिट्टियां दोमट से गाद युक्त दोमट और मध्यम से

पश्चिमी घाट और कर्नाटक के पठार का आर्द्र से लेकर अर्धशुष्क क्षेत्र

इस क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले राज्य:

  • कर्नाटक
  • तमिलनाडु
  • केरल
  • पांडिचेरी और लक्षद्वीप के केन्द्रशासित प्रदेश

इस क्षेत्र की मिट्टियां

  • लैटेराइट मिट्टी
  • लाल बलुई या कंकड़ीली मिट्टी
  • लाल दोमट मिट्टी
  • तटीय जलोढ़ मिट्टी
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