Best Viewed in Mozilla Firefox, Google Chrome

03
Jul

पूसा बासमती-1121

पूसा बासमती-1121

  • पूसा बासमती-1121 को दिल्ली प्रदेष द्वारा सन् 2003 में विमोचित किया गया ।
  • यह प्रजाति पकाने के बाद सर्वाधिक लम्बे दाने (लगभग 22 मि.मी.), आसाधरण आयतन फैलाव, अच्छे स्वाद और सुपाच्यता के लिए विख्यात है ।
  • यह प्रजाति पक्कर तैयार होने में 145 दिन का समय लेती है तथा इसकी औसत उपज 18-20 कु./एकड़ होती है ।
  • पूसा बासमती-1121 की खेती से अधिक लाभ के कारण बासमती धान के उत्पादन में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिलता है ।
  • अध्यक्ष, अखिल भारतीय धान निर्यातक संघ के द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकड़ो के अनुसार, खरीफ 2008 में बासमती धान के 15 लाख क्षेत्रफल में लगभग 50-60 प्रतिषत हिस्सा पूसा बासमती-1121 का था ।
  • अपने अद्भुत गुणों और दानों की पकने की गुणवत्ता के कारण, अंतर्राश्ट्रीय बाज़ार में पूसा बासमती-1121 की दर परम्परागत बासमती (तरावड़ी बासमती) की तुलना में लगभग 200 यू.एस. डालर प्रति टन अधिक ह

बासमती किस्मे

उत्तर भारत के बासमती उगाने वाले क्षेत्रों में खेती के लिए संस्तुति की गई । बासमती एवं सुगंधित धान की उन प्रजातियों का जिन्होंनंे उत्पादन, उत्पादकता, किसानों की आय बढ़ाने और विदेषी मुद्रा अर्जित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, संक्षिप्त विवरण दिया गया है ।

पूसा बासमती-1

  • बासमती धान के विकास में पहली महत्वपूर्ण सफलता सन् 1989 में पूसा बासमती-1 प्रजाति के व्यावसायीकरण से मिली ।
  • यह प्रजाति अर्द्ध-बौनी, प्रकाष अवधि अप्रभावित और अधिक उपज देने वाली है । इस प्रजाति ने भारत में बासमती धान के उत्पादन में एक क्र्रान्ति ला दी ।
  • अत्यधिक लम्बे और सुगन्धित दाने, पकाने की कम अवधि और पकाये हुए लम्बे दानों के साथ 22-26 कु./एकड़ की उपज और षीघ्र तैयार होने (135-140 दिन) के गुणों ने पूसा बासमती-1 को किसानों, निर्यातकों और उपभोक्ताओं के बीच सबसे लोकप्रिय प्रजात

बासमती एवं सुगंधित धान की किस्में तथा उनकी सस्य क्रियाऐं (प्रगतिषील किसानों के अनुभवों पर आधारित)

  • भारतीय उपमहाद्धीप में उत्पादित बासमती धान अपनी गुणवत्ता के लिए विष्व बाज़ार में एक अलग स्थान रखता है ।
  • महत्वपूर्ण गुण जैसे दानों की आकृति, सुगन्ध, लम्बाई और चैड़ाई, अच्छा स्वाद, सुपाच्यता और अधिक समय तक इन गुणों का बने रहना, बासमती धान को व्यावसायिक दृश्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण बनाते है ।
  • बासमती धान की परम्परागत प्रजातियां लम्बी, गिरने के प्रति संवेदनषील प्रकाष-अवधि और तापमान से प्रभावित होने के साथ ही कम उपज देती हैं ।
  • इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए भारतीय कृशि अनुसंधान संस्थान ने साठ के दषक में डा. एम.एस. स्वामीनाथन के नेतृत्व में अधिक उपज देने वाली बासमती प्रजातियों के विकास के लिए एक प्रजनन कार्यक्रम षुरू किया ।
  • वर्तमान समय में बासमती की

उत्तर भारतीय स्थितियों के अंतर्गत संकर चावल बीजोत्पागदन प्रौद्योगिकी

भारत में संकर चावल प्रौद्योगिकी के विकास एवं उपयोग के प्रयास 1970 के दशक के आरंभ में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थाान में प्रारंभ हुए। तथापि इस दिशा में क्रमबद्ध अनुसंधान कार्य 1989 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की एक मिशन मोड परियोजना के अंतर्गत आरंभ हुआ। सतत अनुसंधान कार्य के परिणामस्वपरूप हमारे देश में चावल की अनेक संकर किस्में विकसित हुई हैं और इनमें से 23 को अधिकारिक रूप से जारी किया जा चुका है।

संकर चावल प्रौद्योगिकी को अपनाने में संकर बीज की उच्चं लागत कुछ प्रमुख बाधाओं में से एक है। इस प्रौद्योगिकी को पर्याप्तस रूप से न अपनाने का एक कारण संकर बीज की कम उपज है जो लगभग 1-1.5 टन/है. होती है। आवश्यरकता इस बात की है कि बीज की लागत को कम करने के लिए इसकी उपज 2.5 टन/है. से अधिक की जाए। वर्तमान म

Panicle of Rice – Inflorescence चावल का पुष्पगुच्छ—पुष्पक्रम:

1. पुष्पगुच्छ के मुख्य अंग हैं- आधार, अक्ष, प्राथमिक और द्वितीयक शाखाएं, पेडिकल, मूल तुष (glumes) और शूकिका या (spikelet)।

2. पुष्पगुच्छ का अक्ष इसके आधारभाग से शीर्ष की ओर निकलता है। इसमें 2-4 सेमी के अंतराल पर 8-10 पर्व होते हैं जिनसे प्राथमिक शाखाएं निकली होती हैं।  

3. प्राथमिक शाखाओं से द्वितीयक शाखाएं निकलती हैं।

4. प्राथमिक और द्वितीयक शाखाओं से Pedicels निकलते हैं जिनके शीर्ष पर शूकिकाएं स्थित रहती हैं।

5. आमतौर पर पुष्पगुच्छ के आधार भाग से केवल एक प्राथमिक शाखा निकलती है लेकिन अनुकूल दशाओं में दो या तीन तक प्राथमिक शाखाएं निकल सकती हैं।

6. आधार भाग से निकले दो या तीन प्राथमिक शाखाओं वाला पुष्पगुच्छ मादा पुष्पगुच्छ कहलाता है।

02
Jul

Rice Florets चावल का पुष्पक

Rice Florets चावल का पुष्पक

1.चावल का पुष्पक्रम एक पुष्पगुच्छ होता है जिसमें एकल पुष्प की बाली होती है जो शाखाओं पर लगी होती है। पुष्प प्रमेयिका( lemma) और अंतःपुष्पकवच( palea) द्वारा घिरा होता है जो ऐसी संरचनाएं हैं जो बिना भूसी वाले दाने के कैरयोप्सिस को आवृत करने वाली भूसी के आवरण ( hull of husk) या छिलके का निर्माण करती हैं।

2.छिलका ( hull) रोमिल होते हैं। प्रमेयिका पुष्प के अक्ष को आवृत रखती है। इसमें शूक जैसे लंबे या ठिगने प्रवर्ध निकले होते हैं जिसे awn कहते हैं। कुछ चावलों में  awn नहीं होते। Palea दूसरा तंत्रिकायुक्त तुष या glume है।

3.बाहरी glume  फलहीन और अस्पष्ट होते हैं जो lemma और palea के केवल एक चौथाई होते हैं।

4. फूल के आधार भाग में बाली द्वारा दो लॉडीक्यूल घिरे होते हैं जो दिखने में कांच की तरह पारदर्शी और लूनाग्र होते हैं।

5.पुमंग( androecium) में 6 पुंकेसर( stamens) होते हैं जबकि जायांग यानि gynoecium म

02
Jul

Rice Leaf चावल के पत्ते

Rice  Leaf  चावल के पत्ते:

1. वयस्क पत्ते के चार भाग होते हैं: पत्रकोष(sheath), पत्र फलक(blade), जिह्विका(ligule) और पालि(auricles)। पत्ते विभिन्न लंबाइयों,रूप,कठोरता वाले होते हैं और ये तने को ढकते हैं।

2. ये वयस्क पत्ते चौरस होते हैं और किस्मों तथा खेती के तरीके के अनुसार इनकी लं. और चौड़ाई असमान होती हैं।
पत्रकोष और पत्र फलक की संधि को कालर कहते हैं। पत्रकोष के आधार भाग में नीचे जो फूला हुआ भाग होता है जहां यह नाल के साथ जुड़ता है pulvinus कहलाता है।

Terms : FIS
02
Jul

Rice Culm चावल का नाल(तना)

चावल का नाल(तना)

1.नाल चावल के जुड़े हुए तने होते हैं जिनका विकास प्ररोहांकुर या plumule (बीज के भ्रूण की मूल कलिका) जुड़े हुए

2.नाल की ऊंचाई पर्यावरण, प्रबंधन के तरीके और किस्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है।

3.मौजूदा किस्में 30-46 इंच की ऊंचाई की होती हैं। वर्धन काल की लंबाई पर यह निर्भर करता है कि नाल में कितने पर्व निकलेंगे(आम तौर पर यह 13-16 होती हैं)।

4.प्रायः ऊपरी पर्वांतर (internode) सबसे लंबा होता है और इसी में शीर्ष या पुष्पगुच्छ लगते हैं।

02
Jul

चावल की जड़ें(मूल)

चावल की जड़ें(मूल):


1.चावल के दानों के अंकुरण के तुरंत बाद पौधे के आधार भाग के बाहर और भीतर की ओर रेशेदार मूल तंत्र विकसित होता है।
2.अंततः तने (नाल) के निचले पर्व से शाखायुक्त उपस्थानिक मूल निकलते हैं।
3.जड़ों की साइज और लंबाई विभिन्न होती हैं। जल निकास की दशा में जड़ों का विकास अच्छा होता है जो कि पौधे के ऊपरी विकास के समानुपाती होता है।
4. जड़ों का अधिकतम विकास टिलरिंग अवस्था में होता है, इसके बाद इसमे कमी आने लगती है और दाने लगने की अवस्था तक आते-आते इनका विकास रुक जाता है।

02
Jul

चावल के पौधे का परिचय

चावल के पौधे का परिचय

1.    चावल(Oryza sativa) एक जलीय घास है जो  Poaceae फैमिली से संबंधित है। यह उष्णकटिबंधीय और उपोष्ण कटिबंधीय द.पूर्वी एशिया और अफ्रीका की मूल वनस्पति है।

2.    वर्धन के लिए गर्मी और आर्द्रता की आवश्यकता वाला यह पौधा 2-6 फीट तक लंबा होता है  और इसके पत्ते लंबे,चौरस,नुकीले होते हैं और इसमें डंठल वाली बालियां होती हैं जिनमें दाने लगते हैं जिन्हें चावल कहा जाता है।

3.    आनुवंशिक जैव-विविधता के मामले में चावल आत्यंत समृद्ध है जिसके दुनिया भर में उगने वाले हजारों किस्में हैं।

4.    विश्व भर में यह हजारों लाखों लोगों के लिए भोजन का मुख्य श्रोत है। दुनिया भर के समाजों के सांस्कृतिक विरासत में चावल की बड़ी गहरी उपस्थिति है।

5.    विश्व का 4/5 चावल छोटे किसानों द्वारा उगाया जाता है और स्थानीय रूप से खपत किया जाता है।
 

 

Copy rights | Disclaimer | RKMP Policies