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राइस येलो ड्वार्फ

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1. बौनापन और प्रोफ्यूज्ड टिलरिंग के साथ सामान्य क्लोरोसिस

के द्वारा इस रोग को पहचाना जा सकता है। क्लोरोटिक पत्ते सकसमान रूप से हल्के पीले रंग के हो जाते हैं। वयस्क संक्रमित पौधों में प्राय: कल्ले नहीं निकलते अथवा नगण्य कल्ले बिना दानों के निकलते हैं। वृद्धि के बाद की अवस्थाओं में संक्रमित पौधों में कटाई से पहले कोई लक्षण नहीं भी दिखाई पड़ सकते हैं। 

2. यह रोग phytoplasmas के कारण होता है और सामान्य तौर पर येलो ड्वार्फ से संक्रमित चावल के पौधों के फ्लोएम ट्यूब में देखा गया है। ये प्लियोमॉर्फिक पिंड होते हैं जिसकी माप 80-800 मिमी होती है, कोशिका भित्ती नहीं होती और इकाई झिल्ली से घिरी होती है। 

3. यह रोग लीफहोपर, Nephotettix virescens द्वारा फैलता है। कीटों में रोगग्रस्त पौधों को आधे घंटे तक खाने से रोगाणु लग जाते हैं और फाइटोप्लाज़्मा फैलाने के लिए अंडे सेने की अवधि लंबी (20 दिनों) की होती है।  

4. कीट जब तक मर नहीं जाते तब तक संक्रमित रहते हैं। निम्न तापमान और उच्च आर्द्रता का संयोजन लीफहोपर के प्रजनन के लिए अनुकूल होता है जिसके कारण रोग चरम पर पहुंच जाता है। रतून का पौधा ठूंठ से निकलता है जो रोगग्रस्त हो सकता है और बाद के संक्रमण के लिए स्रोत का कार्य कर सकता है।  

चावल के येलो ड्वार्फ रोग को निम्नलिखित उपायों द्वारा कम किया जा सकता है: 

• खेतों की साफ-सफाई कर, 

• कार्बोफ्यूरान से बीजोपचार और फिर रोपण से पहले कार्बोफ्यूरान विलयन में (75% WP) 36 घंटे तक भिगोएं (प्रभावकारी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है)। 

• डायमेक्रॉन (0.03%), कार्बोफ्यूरान (0.04%), डायमिथॉएट (0.025%) और मिथाइल डोमेटिन Methyl Dometin (0.025%) का छिड़काव करें।  100 ppm पर ch lorotetracycline का छिड़काव करना चहिए। 

 

 

File Courtesy: 
ICAR NEH, Umiam
Image Courtesy: 
डॉ. कृष्णवेनी (DRR)
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