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राइस टुंग्रो वाइरस (Rice tungro virus)

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1. यह रोग 1969 और 1970 के दौरान उत्तर-पूर्व के राज्यों में महामारी

के रूप में पाया गया है। यह सबसे हानिकारक रोगों में से एक है। टुंग्रो से पौधे की वृद्धि रुक जाती है और पत्ते का रंग पीले से लेकर नारंगी रंग के अनेक शेड का होता है। बदरंगता और जंग जैसे धब्बे पत्ते के ऊपरी भाग से नीचे की ओर फैलता जाता है। 

2. युवा पत्ते भी चित्तीदार दिखाई पड़ते हैं और हल्के मुड़े होते हैं जबकि, पुराने पत्ते जंग जैसे रंग के हो जाते हैं।  

3. टुंग्रो दो वायरस – सिंगल स्ट्रैंडेड  RNA  वायरस, राइस टुंग्रो स्फेरिकल वायरस (RTSV) के संक्रमण के कारण होता है और टुंग्रो स्फेरिकल वायरस (RTSV) और डबल स्ट्रैंडेड  DNA वायरस राइस टुंग्रो बैसिलीफॉर्म बैंड वायरस (RTBV), दोनों वायरस अर्ध-सतत तरीके से अनेकों लीफहोपर्स प्रजातियों, खासकर Nephotettix virescens द्वारा प्रसारित होता है। 

4. संक्रमित पौधे को 30 मिनट तक खाने से कीट संक्रामक हो जाता है और खाने के लगभग तुरंत बाद यह संक्रमण फैला सकता है। 

5. नर की तुलना में मादा कीट अधिक तेजी से संक्रमण फैलाते हैं। जंगली चावल, रैटनिंग ठूंठ और घास-फूस चावल की फसल में वायरस के स्रोत हो सकते हैं।  

6. प्रतिरोधी प्रजातियों की खेती कर इस रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है। 

 

 

 

File Courtesy: 
ICAR NEH, Umiam
Image Courtesy: 
डॉ. कृष्णवेनी (DRR)
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