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फ़सल (चावल) के रोग/पीड़कों पर लौह तत्त्व (Fe) का प्रभाव

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1. कई अन्य सूक्ष्म तत्त्वों के साथ Fe की आवश्यकता फाइटोलैक्सिन के निर्माण में पड़ती है, जो पोषक पौधे की प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ा होता है। 

2. यह रोगाणुओं की उग्रता को भी प्रभावित करता है।  Fe की कमी वाले वातावरण में उत्पन्न कोनिडिया को  Fe की उपस्थिति वाले वातावरण की तुलना में अधिक आक्रामक रोगाणु के रूप में पाया गया है।  

3. यद्यपि Fe एक प्रमुख मृदा घटक (0.5 से 5%) है, जहां यह मुख्यतः ऑक्सीकृत अवस्था (Fe +3) में पाया जाता है; इसकी उपलब्धता उदासीन/क्षारीय  pH एरेटेड उच्च भूमि तथा बाढ़ वाले/सिंचित चावल के राइजोस्फेयर में निम्न घुलनशीलता के कारण काम रहती है।  

4. इसलिए, सूक्ष्मजीव (साइडरोफोर) तथा पौधे (रणनीति I- अम्लीय निकास, रणनीति II- फाइटोसाइडरोफोर्स) को उच्चभूमि/उदासीन/क्षारीय मिट्टी में जहां  Fe की कमी होती है, छिटपुट रूप से घुलनशील  Fe +3 से मृदा  Fe की प्राप्ति के लिए विशेष प्रणाली की जरूरत होती है। 

5. इसके विपरीत क्षीण/ऐनॉक्सिक/अम्ल सल्फेट वाली मृदा में  Fe घुलनशील रूप (Fe+2) पाया जाता है। उदासीन/क्षारीय  pH वाली एरेटेड मिट्टी में पौधे तथा सूक्ष्मजीव, Fe की प्राप्ति के लिए जैविक पदार्थों या लोहे पर निर्भर करते हैं, जो Fe के वाहक बैक्टीरिया साइडरोफोर्स, फाइटोसाइडरोफोर - (घास के पौधे जैसा चावल)/ जड़ों द्वारा उत्सर्जित कार्बनिक अम्ल से प्राप्त होते हैं।  

6. इनके बीच, माइक्रोबियल साइडरोफोर्स (राइजोफेरिन, रोडोफेरुलिक अम्ल, हाइड्रोक्सिमेट तथा फेरियोक्सामाइन - B इत्यादि) काफी प्रबल चीलेट्स माने जाते हैं, जो  Fe की कमी कर मृदा जनित रोगाणुओं को दबाते हैं। मृदा जनित रोगाणुओं के जैव-नियंत्रण में साइडरोफोर की भूमिका को समझना अहम है। 

 

File Courtesy: 
DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
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