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फ़सल (चावल) के रोग/पीड़कों पर पोटाशियम (K) की भूमिका

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1.N के विपरीत K का पौधों के रोग तथा पीड़कों पर मुख्यतः सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। सामान्यतः K के अनुकूल प्रभाव कमी के दायरे तक सीमित होते हैं। 

2. पर्याप्त K वाली मिट्टी में अतिरिक्त K की मात्रा राइस ब्लास्ट जैसे कुछ रोगों में वृद्धि करता है। K के प्रतिरोध समर्थन क्षमता के कई आयाम होते हैं। 

3. एंजाइम की सक्रियता तथा उच्च आण्विक भार (सेलुलोज/लिग्निन/प्रोटीन) जैव-संश्लेषण मंो इसकी भूमिका के कारण  फायटोपैथोजेंस में प्राइमरी बिल्डिंग ब्लॉक (एमीनो अम्ल/एमाइड्स/शर्करा) बाधित हो जाते हैं।  

4. इसके अलावा K की कमी से कोशिका भित्तियां पतली हो जाती है और मेरिस्टेम की वृद्धि कम हो जाती है। इससे परपोषी पीड़क आसानी से पौधे के एपिडर्मिस में प्रवेश कर जाता है और उनकी वृद्धि होती रहती है। 

5. क्योंकि K प्रत्यक्ष रूप से स्टोमेटल कार्यों (खुलना-बंद होना) से जुड़ा होता है, इसलिए K मात्रा के कारण पौधे में स्टोमेटा होकर रोगाणु/पीड़क प्रवेश कर सकते हैं। 

6.K पोषक पौधे तथा रोगाणुओं के बीच के पोषण को भी नियंत्रित करता है। KCl का स्रोत (Cl - KCl में NO3 -N के अंतर्ग्रहण को रोकता है) पोषक पौधे के प्रतिरोध को मजबूत बनाने के लिहाज से K2SO4 से बेहतरीन माना जाता है।  K की आपूर्ति के साथ ब्राउन स्पॉट/शीथ ब्लाइट/स्टेम रॉट/बीएलबी रोगों को कम करता है।  

7.K के उर्वरक से वायरस से उत्पन्न होने वाले वनस्पति रोग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। 

8. कीटों की स्थिति में BPH द्वारा हुई हानि K के पोषण से कम होती है, जो प्रमुख रूप से फ्लोएम रस के प्रवाह के बाधित होने से पौधे द्वारा किसी भी भेदन कीटों को भोजन आपूर्ति नहीं होने के कारण होता है। BPH की उच्च प्रतिरोधकता प्राप्त की जा सकती है यदि K की आपूर्ति उतनी ही अधिक की जाए जितनी की N की आपूर्ति हुई हो।  

9.K के प्रयोग का समान लाभदायक प्रभाव भी अन्य कीटों जैसे येलो स्टेम बोरर/थ्रिप्स/हरे टिड्डे/वर्ल मैगट तथा LF पर देखा गया है। इसके अलावा  K की सही आपूर्ति होने से पौधे में नेमाटोडों के कम हमले होते देखे गए हैं। 

 

 

File Courtesy: 
DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
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