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मणिपुर व मेघालय में कीट प्रकोप

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मणिपुर व मेघालय में कीट प्रकोप

1.चावल के इअर ईटिंग कैटरपिलर का प्रकोप असम व मणिपुर (पाठक व अन्य, 2001), अरुणाचल, मेघालय और त्रिपुरा में 1982 (बर्वाल, 1983) के दौरान दर्ज किया गया था।

2. 1977 के दौरान, काले बालों वाले कैटरपिलर का प्रकोप मेघालय (सचन व गंगवार, 1979) में दर्ज किया गया था। चावल के हिस्पा का प्रकोप मेघालय और अरुणाचल प्रदेश में 1987 (पाठक, 1987) में दर्ज किया गया था।

3. 1986-1990 के दौरान 1990, शील्ड बग की दो प्रजातियों (यूसारोकोरिस गल्टीगर झुंल एवं नेज़ारा विरिडुला एल.) द्वारा दूधिया नरम आटे और कडे आटे के चरणों में मणिपुर में (पाठक व अन्य, 2001) चावल पर हमला करना पाया गया।

4. चावल स्टेम बोरर की पांच प्रजातियों में से सेसामिआ इंफरंस वॉक तथा चिलो पॉलीक्राइसस वॉक घाटियों में कम अनुपात में हुए। हालांकि क्षेत्र में स्टेम बोरर नियमित कीट है लेकिन मेघालय में यह कभी-कभी के कीट के रूप में दर्ज हैं।

5. पौधे के टिड्डों में, मणिपुर में चावल की फसल में गर्मियों के आरम्भ में सफेद पीठ वाला पौधे का टिड्डा एक बड़ी समस्या था (बरवाल व राव, 1986)।

6. मैनोदास व शेख (1989) ने मणिपुर में टिड्डों की विभिन्न प्रजातियों, उनके मेजबान पौधों और गतिविधि की अवधि की सूचना दी।

7. मणिपुर में कई परजीवी और शिकारी चावल-कीट दर्ज़ किए गए थे (बरवाल व अन्य, 1994) और मेघालय में (आज़ाद ठाकुर व बरवाल, 1987)। प्लेटिगेस्टर ऑरिज़ी क्यू. चावल के गॉल मिज का मुख्य लार्वा चरण का परजीवी है और उसके नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

File Courtesy: 
ICAR NEH, Umiam
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