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खर-पतवारों पर चावल के ऐलेलोपैथिक प्रभाव

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• 90 के दशक में चावल के ऐलीलोपैथिक अनुसंधान खर-पतवार को दबाने वाली चावल किस्मों की जांच पर आधारित था साथ ही इस दौर में रासायनिक यौगिकों की पहचान पर भी ध्यान दिया गया। चावल में 15 देशों से 60 कृषि किस्में हैं, जिनके ज्ञात ऐली ऐलेलोपैथिक प्रभाव हैं तथा इनमें से कुछ किस्में एक निश्चित त्रिज्या के भीतर लगभग 90% की दर पर खर-पतवारों का नियंत्रण करती हैं।   

• जापान में, 189 चावल किस्में हैं, जिनमें (72) जापानी प्रकार, 18 इंडिका प्रकार, 32 जावानिका प्रकार, 29 चाइनीज प्रकार तथा4 अफ्रीकन प्रकारों का  ऐलेलोपैथिक प्रभाव के लिए मूल्यांकन किया गया। जैपोनिका प्रकार के चावल के उन्नत किस्में ऐलेलोपैथिक रूप से कम सक्रिय थीं। जावानिका चावल के कुछ मूल किस्मों तथा लाल चावल की किस्मों ने प्रबल प्रतिरोध सक्रियता दिखाई (FFTC टेक्निकल बुलेटिन 1993). 

• चंग इल्मिन तथा अन्य (1997) द्वारा किए एक अध्ययन में चावल की भूसी के निष्कर्षण  में अधिक ऐलेलोपैथिक विषैले पदार्थ पाये गये तथा निष्कर्षण की सांद्रता के बढ़ने से Echinochloa crusgalli का अंकुरण बाधित होता देखा गया। 

• चावल की किस्मों के बीच जेनेटिक अंतर होता है। कवागुची तथा अन्य (1997) ने प्रभावी तथा अप्रभावी Monochoria vaginalis var.  plantaginea बीजों के अंकुरण पर 12 चावल किस्मों के प्रभाव का प्रयोगशाला में अध्ययन किया गया, जिसमें यह पाया गया कि सभी 12 किस्मों ने 3 अलग-अलग वर्षों में एकत्र की गई Monochoria की प्रभावी तथा अप्रभावी दोनों ही प्रजातियों के अंकुरण को बढ़ावा दिया।    

• किम-किल उंग (1997) के मुताबिक खर-पतवारनाशन के ऐलीलोपैथी इस्तेमाल की सर्वाधिक पर्यावरण मान्य तथा टिकाऊ विधि है प्रमाणित ऐलीलोपैथिक गुण वाले पौधे की किस्मों का विकास करना। चावल में सर्वाधिक सामान्य ऐलीलोपैथिक यौगिक (किम किल उंग तथा अन्य 1997) की पहचान p-हाइड्रोक्सी बेंजोइक, वैनिलिक, p-कॉनुमेरिक तथा फेरुलिक एसिड के रूप में की गई है। 

 

File Courtesy: 
चावल में खर-पतवार प्रबंधन, DRR ट्रैनिंग मैनुअल
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