Best Viewed in Mozilla Firefox, Google Chrome

भारत में चावल उत्पादक विभिन्न मृदाओं (मिट्टियों) का विवरण

भारत की चावल उत्पादक मिट्टियों को निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

1. उप-पर्वतीय मिट्टी

2. पहाड़ी मिट्टी

3. तराई मिट्टी

4. चूनायुक्त जलोढ़ मिट्टी

5. नदीय जलोढ़ मिट्टी

6. लैटेराइट मिट्टी

7. खारी (लवणयुक्त) और क्षारीय मिट्टी

8. लाल और पीली दोमट मिट्टी

9. लाल मिट्टी

10. काली मिट्टी

11. डेल्टाई मिट्टी

12. तटवर्ती जलोढ़ मिट्टी

बासमती धान की खेती को लाभप्रद बनाना

बासमती धान की खेती को लाभप्रद बनाने के लिए सही प्रबन्धन अति आवष्यक है ।

सफल किसान वही है जो कम से कम लागत पर अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त कर सके ।

कृशि लागतों को हम निम्नलिखित बातों का ध्यान रख कर कम कर सकते हैं । जैसे कि कीट नाषकों का अन्धाधुन्ध प्रयोग न करके कीटों के हमले को ध्यान में रखकर संस्तृति की गई दवाओं का ही प्रयोग करें, परन्तु बीमारी के प्रकोप से बचने के लिए समय सारिणी के अनुसार बीमारी आने से पहले ही सुरक्षात्मक उपाय करें क्योंकि जब तक बीमारी के लक्षण साफ नजर आते हैं जब कि बीमारी काफी नुकसान कर चुकी होती है ।

फसल का नियमित रूप से हर दो तीन दिन में एक बार कइ्र्र जगह से निरीक्षण अवष्य करते रहें ।

बार-बार और अलग-अलग छिड़काव करने की बजाय कीट नाषकों एवं फफूंदी नाषकों को आपस में मिलाकर सामूहिक छिड़काव करें ।

तना गलन रोग ;ैजमउ त्वजद्ध:

  • इस रोग में पानी की सतह के पास से तना गल जाता है एवं पौधा मुरझा जाता है एवं गिरने लगता है ।
  • ऊपर से पकड़ कर खींचने पर पौधा आसानी से टूट जाता है । इसकी रोकथाम के लिए खेत में पानी खड़ा न रखें ।

दाने का काला पड़ना ;ज्ञमतदमस ैउनजद्ध

  • इस रोग का आक्रमण सिर्फ दाने को ही प्रभावित करता है । दाना अन्दर से काला पड़ जाता है अथवा चूर्ण सा बन जाता है ।
  • ऐसे दाने उगने की षक्ति खो देते हैं । कई बार दाना खोल से बाहर दिखाई देता है । यह रोग आमतौर पर कम अवधि की किस्मों में ज्यादा लगता है या फिर ज्यादा अगेती लगाई गई धान पर लगता है । रोकथाम के लिए संस्तृति से अधिक या यूरिया का इस्तेमाल न करें । फसल को अधिक अगेती न लगाएं । बीज के लिए बोई गई फसल पर टिल्ट या रिजल्ट का 200 से 250 मि.ली. 120 से 150 लीटर पानी में छिड़काव करें ।

भूरा धब्बा रोग ;ठतवूद स्मं चवजद्ध

  • इस रोग में पत्तों पर आंख के आकार के धब्बे पड़ जाते हैं जो किनारों से भूरे एवं बीच में गहरे रंग के होते हैं ।
  • ये धब्बे बाद में दानों पर भी पड़ जाते हैं जो गुणवत्ता एवं पैदावार पर विपरीत प्रभाव पड़ता है ।
  • इसकी रोकथाम के लिए इण्डोफिल-जेड 78 (जिनेव 75 प्रतिषत च्द्ध 500 ग्राम प्रति एकड़ या हिनोसान (इडीमिनफाॅस) 250 मि.ली. प्रति एकड़ या किटाजीन (48 प्रतिषत), 400 मि.ली. प्रति एकड़ 120 से 150 लीटर पानी में छिड़काव करें ।

तने के ऊपरी पत्तें का गलना ;मंजी त्वजद्ध

  • इस रोग में पत्तें का वह हिस्सा जो तने के ऊपर लिपटा रहता है, गलने के कारण फसल प्रभावित होती है ।
  • इसके कारण या तो बाली पूर्णतया बाहर ही नहीं या उसमें दाने नहीं बनते और उसमें सफेद रंग की फफूंदी नजर आती है ।
  • जिसके परिणामस्वरूप दाने काले पड़ जाते है। इसके लिए फसल के गोभावस्था
03
Jul

कंग्यारी ;थ्ंसेम उनजद्ध

कंग्यारी ;थ्ंसेम उनजद्ध

  • यह रोग अधिक कार्बनिक खाद एवं नाईट्रोजन की अधिक मात्रा डालने पर अधिक लगता है ।
  • इसमें दानों की जगह उनमें काले रंग का पाउडर गाठों के रूप में बन जाता है जिसे आमतौर पर ग्रामीण भाशा में लोग हल्दी रोग कहते है ।
  • इसके नियंत्रण के लिए बाली निकलने के आरम्भिक अवस्था (गोभावस्था) में 500 ग्राम कापर आक्सीक्लोराईड (50 प्रतिषत च्द्ध, क्लाईटाक्स/ब्लू काॅपर या 250 ग्राम कोसाइड ;ब्वचचमत भ्लकतवगपकम 77द्ध का 150 लीटर पानी में छिड़काव करें ।
  • पत्तें में धारियों का रोग ;स्मं जतमंबीद्ध
  • इसमें पत्तें में धारियां बन जाती हैं जो कि बाद में लाल हो जाती हैं एवं फसल पके हुए खेत की तरह प्रतीत होती है ।
  • इसकी रोकथाम के लिए बीज उपचारित करके बोएं । 12 ग्राम ैजतमचजवबलबसपद या 40 ग्राम ठंबजतपापसस ;2 इतवउव.2 छपजतव.च्तवचंदम 1ए 3 क्पंसद्ध या 500 ग्राम ठपवउलबपद ;ज्ञंनहंउलबपद 3
03
Jul

बकाने

बकाने

  • यह फफूंदी से होने वाला रोग है जो कि जिबरेला नामक फफूंदी से फैलता है । इस रोग से ग्रसित पौधे सामान्य पौधों से ऊॅचे बढ़कर पीले पड़ जाते हैं एवं सूख जाते हैं ।
  • यह रोग अधिकतर बीज जनित होता है । इसलिए इसकी रोकथाम के लिए बीज उपचार ही एक प्रभावी तरीका है ।
  • एक बार खेत में रोग का प्रकोप हो जाने के बाद इस पर नियंत्रण पाना अभी सम्भव नहीं पाया हैं ।
  • पूसा बासमती 1121 किस्म इस बीमारी के लिए संवेदनषील है, अतः इस किस्म में इसके प्रबंधन का विषेश ध्यान रखें ।
  • अगर पौधाषाला में में बकाने का प्रकोप दिखता है तो पौध उखाड़ने के बाद उसे 0.1 प्रतिषत बावस्टिन के घोल में जड़ को डुबाकर 12 घंटे तक रखे, इसके बाद रूपाई करें

गर्दन तोड़ रोग ;छमबा ठसंजद्ध

  • जैसा कि नाम से विदित है यह बाली को गर्दन से प्रभावित करता है । इसमें जहां से बाली में दाने प्रारम्भ होते हैं वहां पर काले रंग का धब्बा पड़ता है ।
  • एवं बाली वहाॅं से टूट कर लटक जाती है एवं सूख जाती है, तथा उसमें दाने नहीं बन पाते । यह रोग बासमती किस्मों के लिए अत्यन्त घातक है ।
  • इससे पैदावार अत्यधिक प्रभावित होती है । यह बाली निकलते समय मौसम षुश्क रहने पर या तेज हवा के कारण अधिक फैलता है ।
  • इसके इलाज के लिए जब बाली बाहर न आई हो, परन्तु गोभ में पूरी बन चुकी हो उसी समय 120 ग्राम ट्राईसाइक्लाजोल (65 प्रतिषत) घुलनषील पाऊडर जो कि बाज़ार में बीम/सिविक/ब्लास्टआ फ/ब्लास्टिन/ओराइजे आदि नामों से मिलता है ।
  • इसका छिड़काव 150 लीटर पानी में छिड़काव करें तथा दूसरा छिड़काव 25 प्रतिषत से 30 प्रतिषत निसरने पर प्रभावी रहता है ।
  • फसल में पानी की कमी न

गुतान झुलसा या तने का झुलसा ;मंजी ठसपहीजद्ध

  • यह बीमारी फफूंदी जनक है । इस रोग में पौधों के तनों पर बैंगनी रंग के धब्बे पड़ जाते हैं जो बाद में सफेद हो जाते हैं ।
  • यह धब्बे धीरे-धीरे पूरे तने एवं पत्तियों पर भी फैल जाते हैं । यह वातावरण में अधिक नमीं एवं गर्मी होने पर तेजी से फैलता है ।
  • इसकी रोकथाम के लिए 300 मि.ली. (हैक्साकोनाजोल 50 प्रतिषत), 5 कोंटाफ/हैक्सजोल/जैन्थों आदि का 150 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें या 400 मि.ली. वैलिडामायसिन 3 प्रतिषत का छिड़काव करें या 200 मि.ली. टिल्ट/रिजल्ट (प्रोपिकोनाजोल 25 प्रतिषत ई.सी.) का छिड़काव करें तथा 10-15 दिन के अन्तर पर छिड़काव दोहराएं ।
  • खेतों एवं मेढ़ों को खरपतवार एवं घास आदि से मुक्त रखें तथा नाइट्रोजन का अधिक प्रयोग न करें ।

पत्ती का झुलसा रोग (ठंबजमतपंस स्मं ठसपहीजद्ध )

  • यह बीमारी जीवाणु जनित है इस रोग का प्रकोप खेत में एक साथ न षुरू होकर कहीं-कहीं ;च्ंजबीमेद्ध षुरू होता है तथा धीरे-धीरे चारों तरफ फैलता है ।
  • इसमें पत्ते ऊपर से सूखना षुरू होकर किनारों से नीचे की ओर सूखते हैं । गंभीर हालात में फसल पूरी सूखी हुई पुआल की तरह नजर आती है ।
  • इस रोग के जीवाणु पौधों की जड़ों, बीज, पुआल आदि धान के अवषेश आदि के जरिए अगले मौसम तक चले जाते हैं ।
  • इस रोग के नियंत्रण के लिए 500 ग्रा. ठपवउलबपद ;ज्ञंनहंउलबपद 3द्ध का 120 लीटर से 150 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें ।

इस रोग का प्रबंधन हम निम्न उपायों से ही कर सकते हैं ।

1. इस रोग के प्रकोप वाले क्षेत्रों में बार-बार एक ही प्रजाति न उगाएं ।

2. रोग रोधी किस्मों को प्रथामिकता दें, जैसे पूसा-1460 (उन्नत पूसा बासमती 1)

3. नाइट्रोजन खाद का प्रयोग अधिक न कर

03
Jul

बाली कुतरने वाली सुण्डी

बाली कुतरने वाली सुण्डी

  • इस कीट की सुण्डीयां झुण्ड में रह कर नुकसान करती है । इसलिए इसे सैनिक कीट कहते हैं ।
  • यह सुण्डियां रात को निकल कर धान की बालियों को काटती हैं तथा दिन में खेतों की दरारों या पौधे में छिप जाती हैं । इसलिए इसे चोर सुण्डी ;ज्ीपम िब्नजजमतद्ध भी कहते है ।
  • यह कीट खेत का 20-25 प्रतिषत तक नुकसान करने की क्षमता रखते हैं ।
  • इनकी रोकथाम के लिए 500 मि.ली. एकालस्क/कविनगार्ड 25 प्रतिषत ई.सी./कविनल फाॅस या 250 मि.ली. डी.डी.वी.पी. (76 प्रतिषत डाइक्लोरोवोस) नुवान, लुवान आदि का छिड़काव करें या 10 किलो फालीडाफाॅल डस्ट या फेनवेलावेट डस्ट का षाम के समय बुरकाव करें परन्तु बाली निकलते समय कार्बेरिल डस्ट का प्रयोग न करें ।
  • गन्धी बग यह कीट धान की विकसित हो रही बालियों से दूध चूस कर नुकसान करते हैं ।
  • इस कीट में से एक प्रकार बदबू आती है तभी इसे गन्धी बग कहते हैं । इसकी
Copy rights | Disclaimer | RKMP Policies