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• केवल चावल की प्रतिरोधी किस्में ही वायरस को वाहकों पर आक्रमण के लिए अनुमति नहीं देतीं।

प्रतिरोधी किस्मों को उगाने से रोग पर नियंत्रण होता है।

क्लोरोटिक स्ट्रीक रोग के लक्षण :

1. वृद्धि पर रोक, नई पत्तियों की स्ट्रिपिंग या मॉट्लिंग, क्लोरोटिक स्ट्रीकिंग। 

2. शूकियों का रंग फीका पड़ जाता है तथा वे अनुर्वर हो जाते हैं।

3. अन्य लक्ष्णों में शामिल हैं ऐंठन, क्रिंकलिंग, लहरदार किनारे, फोड़े, कटाई, खुरदरी सतह तथा गहरी हरी पत्तियां।

4. शिराओं में सूजन उत्पन्न होती है तथा उनकी अनियमित वृद्धि होती है। 

 

12
Sep

क्लोरोटिक स्ट्रीक

क्लोरोटिक स्ट्रीक सर्वप्रथम भारत में कटक में 1978 (अंजनेयुलु तथा अन्य,1980) में देखा गया।

1. इसके लक्षण हैं वृद्धि का बाधित होना, धारियों का निर्माण या नई पत्तियों की मॉट्लिंग तथा क्लोरोटिक स्ट्रीकिंग।

2. शूकियों का रंग फीका पड़ जाता है तथा ये अनुर्वर हो जाती हैं।

प्रतिरोधी चावल किस्मों की खेती से इस रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

• राइस येलो मॉट्ल के नियंत्रण के लिए पारंपरिक विधियों का इस्तेमाल किया जाता है तथा प्रतिरोधी नस्लों को उगाया जाता है।

12
Sep

राइस येलो मॉट्ल का संचरण

राइस येलो मॉट्ल वायरस का संचरण: 

1. इस रोग का वायरस उपकुल Criocerinae, Cryptocephalinae, Galerucinae (Sesselia pusilla), Halticinae (Chaetocnema spp.) तथा Hispinae (Trichispa sericea) से आने वाले क्रिसोमेलिड बीटल द्वारा संचरित होता है। 

2. लंबी सींग वाला टिड्डा Conocephalus merumontanus भी इसके वायरस का संचरण करता है। (Bakker, 1974).

3.Chaetocnema pulla खेतों में वायरस का प्रसार करता है। 

4. कभी-कभी S. pusilla, C. pulla तथा T. sericea 15 मिनट में वायरस को ग्रहण करते हैं और 15 मिनट में उसका संचार भी करते हैं। 

 

12
Sep

राइस येलो मॉट्ल वायरस (RYMV)

1. राइस येलो मॉट्ल वायरस का आकृति-विज्ञान  

2. प्रयोगशाला वाली दशाओं में यह वायरस स्थायी होता है तथा उनका शुद्धीकरण आसान हो जाती है (बेकर,1970, 1974)। बेहतरीन शुद्धता के लिए संक्रमण के 10-12 दिनों बाद ताजा या गहरे-शीतित नव चावल पत्तियों की कटाई उत्तम मानी जाती है।   

3. छोटे टुकड़े को 0.1 M फॉस्फेट बफर pH 5.0 + 0.2% 2-मर्कैप्टोइथेनॉल (1 g पत्तियां /20 ml बफर) में समांगीकृत किया जाता है। कपड़े से निचोड़ा जाता है। क्लोरोफॉर्म (5 मिनट) के साथ एमल्सीकृत किया जाता है तथा कम रफ्तार में अपकेंद्रित किया जाता है। 

4. प्रत्येक 100 मि.ली जलीय फेज में 20 g (NH4)2SO4 मिलाया जाता है तथा उसे हिलोड़ने के दौरान कम रफ्तार से अपकेंद्रित किया जाता है। इस प्रक्रिया को सुपरनैटेंट द्रव के साथ दुहराया जाता है पर इस बार पेलेट को कम रफ्तार के अपकेंद्रण पर रखा जाता है।  

5. उन्हें पुनः बफर pH 5.0 की अल्प मात्रा में नीलंबित

राइस येलो मॉट्ल के विकास को बढ़ावा देने वाले कारक:

• वाहकों की उपस्थिति

12
Sep

राइस येलो मॉटल के लक्षण

राइस येलो मॉटल वायरल रोग के लक्षण:

1. यह वायरस पत्तियों के रंग को फीका करता है, अथवा इन्हें पीला बना डालता है, वृद्धि को रोकता है तथा चावल में अनुर्वरता लाता है।

2. संक्रमित चावल के पौधे पहले बांध के पास पाए जाते हैं, जल्द ही वे खेत में अन्य स्थानों में भी फैल जाते हैं।

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