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रत्ना, सास्याश्री और विकास

स्टेम बोरर का प्रबन्धन

1. राइस बोरर प्रबन्धन में शामिल हैं कल्चरल, होस्ट प्लांट रेसिस्टेंट, केमिकल बायोलॉजिकल और केमिकल विधि।

1.खेत की जुताई मध्य भाग से किनारे की ओर करें।          

2. खेत के गीले रहते जुताई करना अच्छा रहता है क्योंकि सूखे खेत की जुताई में ट्रैक्टर की अधिक ताकत बरबाद होती है।

3. खेत के गीले रहने पर जुताई करना सबसे अच्छा होता है।

4. कठोर खेत की जुताई के लिए तवे या मोल्डबोर्ड वाले हल की आवश्यकता होती है।

5. दूसरी बार के लिए तवे वाले हैरो या टाइन उपकरण उपयुक्त होते हैं।

6. खेत की सतह पर पौधों के जितने भी बेकार अंश हों उन्हें काटकर हटा देना चाहिए ताकि बकेट से होकर मिट्टी के प्रवाह में सहूलियत हो।

1. ट्रैक्टर को खेत के उच्चवर्ती स्थान पर ले जाएं हैरो पर भार डालने 

 के लिए हैंडल पर झुकें और मिट्टी को निचले स्थान की ओर लाएं।

2. हैरो से भार उतारें और फिर से उच्चवर्ती स्थान की ओर लौटें।

3. जब पहली बार कर रहे हों, तो बिना लेवलिंग बोर्ड को जोड़े हैरो का इस्तेमाल करें।

4. लेवलिंग बोर्ड जोड़ कर इस्तेमाल करने पर, यह ध्यान रखें कि हैरो के दांत खुले हों जिससे ये खरपतवारों को निकाल सकें और मिट्टी तथा पानी को तेजी से कीचड़ में बदल सकें।

08
Sep

डॉनी मिल्ड्यू के लक्षण

डॉनी मिल्ड्यू रोग के लक्षण निम्नलिखित होते हैं:

1. डॉनी मिल्ड्यू का संक्रमण पत्ती की ऊपरी सतह पर कोणीय पीले धब्बे के रूप में आरंभ होता है। 

2. आगे चलकर वे चमकदार पीले धब्बे में बदल जाते हैं। 

3. अंततः इन धब्बों के आंतरिक हिस्से पीले किनारे के साथ भूरे रंग के हो जाते हैं। 

4. संक्रमित पत्ते के अंदर की ओर का हिस्सा ठीक और धूसर रहता है, जहां कवक का विकास होता है। संक्रमित प्ररोह, फल तथा बीजों में कवक के स्पोर की सफेद परत चढ़ी रहती है।    

5. सुबह में डॉनी कवक का विकास पत्ती के उल्टी सतह पर होता है। 

 

• स्टेम रॉट प्रबंधन के विकल्पों में पारंपरिक नियंत्रण, रासायनिक नियंत्रण तथा प्रतिरोधी किस्मों की खेती शामिल हैं।

07
Sep

नैरो ब्राउन स्पॉट के लक्षण

 नैरो ब्राउन स्पॉट रोग द्वारा विकसित लक्षण

1. पत्र फलक पर छोटा-संकरा, दीर्घवृत्ताकार से लेकर रैखिक भूरा जख्म उभरते हैं। कभी-कभी ये पत्र आवरण, पुष्पवृंत तथा ग्लूम और छिलके पर भी उत्पन्न होते हैं।   

2. जख्म लगभग 2-10 मिमी तथा 1 मिमी चौड़े होते हैं। 

3. प्रतिरोधी किस्मों में ये जख्म संकरे, छोटे तथा गहरे भूरे होते हैं।

4. संवेदनशील किस्मों में जख्म चौड़े तथा हल्के भूरे होते हैं, जो धूरस उत्तक क्षय के केंद्र पर दिखाई पड़ते हैं। 

5. संवेदनशील किस्मों पर पत्ती का उत्तक क्षय भी दिखाई पड़ता है। 

6. वृद्धि की बाद की अवस्था में जख्म बड़ी संख्या में उत्पन्न होते हैं। 

 

 

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