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बंट (कृष्णिका)

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1. इस रोग में, बाले के कुछ दानें प्रभावित होते हैं, संक्रमण आंशिक अथवा पूर्ण रूप से हो सकता है। इसका पहला लक्षण फसल पकने के समय ग्लूम से होकर काली धारियों के रूप  में दिखाई पड़ता है। 

2. संक्रमित दानों को चुटकी से मसलने पर बीजाणु के काले पाउडर बाहर निकलते हैं। इस रोग का कारण Tilletia barclayana नामक जीवाणु है।  

3. दानों के अन्दर भरे बीजाणु में बढ़ता है, जो गोलाकार काले रंग का होता और साथ ही कंटीला एपिस्पोर होता है। बीजाणु से स्पोरैडिक का जन्म होता है। ये द्वितीयक स्पोरैडिक को भारी मात्रा में जन्म देते हैं।  

4. टेलियोस्पोर्स मिट्टी अथवा बीजों में जीवित रहते हैं और अगले मौसम तक जीवनक्षम रहते हैं। नाइट्रोजन के अत्यधिक प्रयोग से पौधे इस रोग के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। 

5. अगात प्रजातियां में पछात प्रजातियों की तुलना में अधिक प्रभावित होती हैं। ऊष्ण तापमान  (20-30DC) और उच्च सापेक्षिक आर्द्रता (8S% और इससे अधिक) या बाली निकलने के समय रुक-रुक कर बारिस होना रोग के विकास के लिए अनुकूल होता है।

रोग नियंत्रण के उपायों में शामिल हैं:  

 खेत की साफ-सफाई  

 फसल चक्र 

 प्रतिरोधी प्रजातियों की खेती 

 

File Courtesy: 
ICAR NEH, Umiam
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