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Rice Soils

Rice Soils
19
Aug

N की कमी के लक्षण

N की कमी के लक्षण

1. सिंचित चावल में N की कमी काफी कम देखी जाती है, क्योंकि हर जगह N उर्वरक उपलब्ध रहता है। वास्तव से N का प्रयोग काफी प्रचलित है।

2. N की कमी वाले पौधे पीले दिखाई पड़ते हैं तथा उनका विकास बाधित रहता है।

3. पुरानी पत्ती में ये लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ते हैं, क्योंकि N काफी गतिशील होता है।

4. ये हरे से पीले रंग की हो जाती हैं तथा जीर्णता से भूरे रंग का होकर मर जाते हैं।

5. राइस टंग्रो रोग (RTD) के लक्षण / अपर्याप्तता /शीत जख्म के लक्षण भी N की कमी के लक्षणों से मेल खाते हैं।

19
Aug

नाइट्रोजन (N) - N के कार्य

नाइट्रोजन (N) - N के कार्य

1. कई जैविक संरचना/क्रियाशील यौगिकों, जैसे एमीनो अम्ल/प्रोटीन/न्युक्लिक अम्ल/रुबिस्को/एंजाइम्स इत्यादि का एक अहम अवयव होने के कारण N वृद्धि, विकास तथा चावल की उपज को प्रभावित करता है।

2. N प्रबल रूप से सिंक/स्रोत के संबंध को प्रभावित करता है, यह मुख्य रूप से स्रोत के आकार /पत्र क्षेत्रफल इंडेक्स अवधि तथा पत्र क्षेत्रफल अवधि जो सिंक को फोटोसिंथेट्स की आपूर्ति का निर्धारण करता है, के जरिए होता है।

3. पौधों में N का असंतुलित प्रयोग से कई प्रकार के कीटों/रोगों के हमले की संभावना होती है तथा शूकियों की अनुर्वरता बढ़ती है।

File Courtesy: 
DRR टेक्नीक बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम.नारायण रेड्डी, आर. महेन्द्र कुमार एंड बी. मिश्रा, साइट स्पेसिफिक इंटीग्रेटेड न्युट्रिएंट मैनेजमेंट फॉर सस्टेनैबल राइस बेस्ड क्रॉपिंग सिस्टम
19
Aug

चावल में पोषक तत्त्वों की कमी / विषाक्तता के लक्षण और उनका प्रबंधन

चावल में पोषक तत्त्वों की कमी / विषाक्तता के लक्षण और उनका प्रबंधन

1. चावल के पौधे 80 तत्त्वों से अधिक का संस्लेषण करते हैं, पर उनमें केवल 16 तत्त्व ही आवश्यक होते हैं।

2. ये वृहत (C, H, O, N, P, K, Ca, Mg तथा S) तथा सूक्ष्म /ट्रेस / अल्प तत्त्व (Zn, Fe, Mn, B, Cu, Mo, तथा Cl) के समूहों में विभाजित किए जाते हैं, जो पौधे की वृद्धि तथा विकास के लिए उनकी आवश्यकता के आधार पर निर्धारित किया जाता है।

3. पर सभी समान रूप से आवश्यक होते हैं।

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DRR टेक्नीक बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम.नारायण रेड्डी, आर. महेन्द्र कुमार एंड बी. मिश्रा, साइट स्पेसिफिक इंटीग्रेटेड न्युट्रिएंट मैनेजमेंट फॉर सस्टेनैबल राइस बेस्ड क्रॉपिंग सिस्टम
19
Aug

चावल-उड़द

चावल-उड़द

1. ये मूल रूप से उच्च भूमि में उपजाई जाने वाली फ़सलें हैं, जो नम भूमि/निम्न भूमि में उपजाए (रिले क्रॉपिंग) जाते हैं, जिसमें बची हुई नमी के इस्तेमाल द्वारा फ़सल की अवधि को बढ़ाया जाता है।

2. शुष्क भूमि फ़सलों की मुख्य चावल फ़सल के साथ थोड़ा/ बिना किसी भूमि तैयारी के रिले सोइंग अवश्य करनी चाहिए।

3. चावल-उड़द (रबी) की खेती आंध्र प्रदेश के कृष्णा डेल्टा में (तटीय इलाका होने के कारण यहां का तापमान 18 से 20 डिग्री से. से नीचे नहीं गिरता, जो आदर्श माना जाता है) तथा तमिलनाडु की जलोढ़/काली मिट्टी में काफी लोकप्रिय है।

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DRR टेक्नीक बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम.नारायण रेड्डी, आर. महेन्द्र कुमार एंड बी. मिश्रा, साइट स्पेसिफिक इंटीग्रेटेड न्युट्रिएंट मैनेजमेंट फॉर सस्टेनैबल राइस बेस्ड क्रॉपिंग सिस्टम
19
Aug

चावल-सूर्यमुखी

चावल-सूर्यमुखी

1. यह फ़सल प्रणाली उत्तर-पश्चिमी भारत में कुछ फ़ायदों की वजह से अभी भी लोकप्रिय है। यह देर से बुआई की स्थिति में (खासकर जहां मिट्टी के सूखने की कम रफ्तार के कारण समग्र फ़सल अवधि लंबी होती है) सबसे अधिक उपयुक्त होती है।

2. अपनी तीव्र वृद्धि से यह अवांछित चावल (दक्षिण भारत में) के पौधों के विकास को कम करता है।

3. इसमें सिंचाई की कम संख्या की आवश्यकता होती है तथा मूंगफली जैसी अन्य व्यापारिक फ़सल की तुलना में जैविक दबाव कम होता है।

4. 0.2% सोडियम बोरेट / हेडिंग पर बोरिक अम्ल का पत्र छिड़काव सही बीज भराव के लिए अहम माना जाता है।

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DRR टेक्नीक बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम.नारायण रेड्डी, आर. महेन्द्र कुमार एंड बी. मिश्रा, साइट स्पेसिफिक इंटीग्रेटेड न्युट्रिएंट मैनेजमेंट फॉर सस्टेनैबल राइस बेस्ड क्रॉपिंग सिस्टम
19
Aug

चावल-काबुली चना

चावल-काबुली चना

1. काबुली चना आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा उड़ीसा की उच्च भूमि क्षेत्रों में और तराई के वर्षाजल प्राप्त भूमि चक्रित किया जाता है।

2. चावल की खेती में काबुली चना के फ़सल चक्रण से BNF द्वारा नाइट्रोजन का (25-30 kg ha-1) लाभ मिलता है।

3. इसमें उस P को प्राप्त करने की भी क्षमता होती है, जो मूल रूप से दूसरे पौधों को, खासकर वर्टिसोल में छिछली जड़ों वाले चावल के पौधों को उपलब्ध नहीं होता। यह बिखरे हुए घुलनशील Ca- P को अपने साइट्रिक अम्ल द्वारा राइजोस्फेयर को अम्लीकृत कर संघटित करता है।

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DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
19
Aug

चावल-मूंगफली

चावल-मूंगफली

1. चावल-मूंगफली तीसरी अहम फ़सल प्रणाली (लगभग 1m ha शामिल) है। चावल-मूंगफली की INM पद्धतियां भी चावल-गेहूं प्रणाली के समान ही होती हैं। बस उनमें कुछ परिवर्तन किए जाते हैं।

2. चावल के पौधे के साथ उगने वाली मूगफली फ़सल को BNF की पर्याप्त मात्रा देने के लिए राइजोबियम के साथ उपचारित करना चाहिए।

3. अपने आप उगा चावल का पौधा रबी मूंगफली के पौधे की आरंभिक अवस्था में बड़ी समस्या उत्पन्न करता है। अतः अवांछित पौधे द्वारा पोषण के अवशोषण को रोकने के लिए चयनित खर-पतवारनाशी का इस्तेमाल करना चाहिए।

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DRR टेक्नीक बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम.नारायण रेड्डी, आर. महेन्द्र कुमार एंड बी. मिश्रा, साइट स्पेसिफिक इंटीग्रेटेड न्युट्रिएंट मैनेजमेंट फॉर सस्टेनैबल राइस बेस्ड क्रॉपिंग सिस्टम
19
Aug

चावल-गेहूं

चावल-गेहूं

1. इस फ़सल प्रणाली के तहत 33% चावल तथा 42% गेहूं की खेती की जाती है, जो लगभग 10 m ha को शामिल करती है। चावल तथा गेहूं दोनों की उपज़ में कमी देखी गई है।

2. मृदा के जैविक पदार्थों की हानि, मृदा संरचना/उप-मृदा स्तर में गिरावट तथा Zn व Mn की कमी चावल-गेहूं फ़सल प्रणाली में उत्पादकता की गिरावट के प्रमुख कारण हैं।

3. गेहूं के बाद मूंग की फ़सल के साथ खेती करने के लिए उपयुक्त होने की वजह से, जिसमें पर्याप्त जल की मात्रा का इस्तेमाल किया जाता है, N की आपूर्ति तथा मृदा के जैविक पदार्थों की मात्रा में सुधार लाने में मदद मिलती है।

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DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
19
Aug

चावल आधारित फ़सल प्रणालियों के लिए पोषण प्रबंधन

चावल आधारित फ़सल प्रणालियों के लिए पोषण प्रबंधन

चावल आधारित विभिन्न फ़सल प्रणाली में निम्न शामिल हैं:

1. चावल-गेहूं

2. चावल-मूंगफली

3. चावल- सूर्यमुखी

4. चावल- उड़द

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DRR टेक्नीक बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम.नारायण रेड्डी, आर. महेन्द्र कुमार एंड बी. मिश्रा, साइट स्पेसिफिक इंटीग्रेटेड न्युट्रिएंट मैनेजमेंट फॉर सस्टेनैबल राइस बेस्ड क्रॉपिंग सिस्टम
19
Aug

INM की सफलता के लिए जल प्रबंधन

INM की सफलता के लिए जल प्रबंधन

1. जल बहाव से (खेत से खेत प्रणाली में) होने वाली नाइट्रोजन हानि को रोकने के लिए दक्ष जल नियंत्रण की आवश्यकता होती है।

2. नाइट्रोजन की टॉप ड्रेसिंग खेत से पानी के निकलने के बाद करना चाहिए।

3. आरंभिक अवस्थाओं में छिछले स्तर में जलजमाव (1-2 cm) होना चाहिए, पर प्रजनन अवस्था में यह 2-5cm के उच्च स्तर के साथ होना चाहिए।

4. फ़सल की कटाई से 10 दिन पूर्व खेत से पानी का निकास कर लेना चाहिए।

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DRR टेक्नीक बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम.नारायण रेड्डी, आर. महेन्द्र कुमार एंड बी. मिश्रा, साइट स्पेसिफिक इंटीग्रेटेड न्युट्रिएंट मैनेजमेंट फॉर सस्टेनैबल राइस बेस्ड क्रॉपिंग सिस्टम
19
Aug

INM की सफलता के लिए फ़सल प्रबंधन

INM की सफलता के लिए फ़सल प्रबंधन

1. पोषण अनुप्रयोग के प्रति आदर्श प्रतिक्रिया समग्र फ़सल प्रबंधन पर निर्भर करती है।

2. अच्छी गुणवत्ता वाले HYV बीजों का प्रयोग कर, जिनमें पीड़क तथा रोग प्रतिरोधी तथा सहनशील हो, चावल की स्वस्थ फ़सल पाई जा सकती है।

3. IPM पद्धतियों के प्रयोग से खर-पतवार तथा पीड़क तथा रोग का नियंत्रण किया जाता है।

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DRR टेक्नीक बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम.नारायण रेड्डी, आर. महेन्द्र कुमार एंड बी. मिश्रा, साइट स्पेसिफिक इंटीग्रेटेड न्युट्रिएंट मैनेजमेंट फॉर सस्टेनैबल राइस बेस्ड क्रॉपिंग सिस्टम
19
Aug

अनुशंसित मात्रा में इस्तेमाल करने की स्थिति में जैविक /जैव-उर्वरक में NPK की औसत मात्रा

अनुशंसित मात्रा में इस्तेमाल करने की स्थिति में जैविक /जैव-उर्वरक में NPK की औसत मात्रा

1. 10 t FYM देता है 50 kg N, 20 kg P तथा 50 kg K ha-1 जिसका 1/3 N (16 kg N) तथा P (7kg) एवं सभी K (50kg) तुरंत फ़सल तक पहुंच जाते हैं।

2. 5 t फ़सल अवशेष (चावल का पुआल) देता है 25 kg N, 10kg P एवं 75 kg K/ha

3. BGA/ऐजोस्पाइरिलम 60-80 kg N उर्वरक के समयुल्य नाइट्रोजन फिक्स करते हैं।

4. पूर्ण हरा खाद (3.0 t सूखा वजन, 2.5% N के साथ) का 30 t देत है 75 kg N. इसी प्रकार दोहरे इस्तेमाल वाले ग्रेन लेग्यूम का 10 t देता है 25 kg N ha-1.

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DRR टेक्नीक बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम.नारायण रेड्डी, आर. महेन्द्र कुमार एंड बी. मिश्रा, साइट स्पेसिफिक इंटीग्रेटेड न्युट्रिएंट मैनेजमेंट फॉर सस्टेनैबल राइस बेस्ड क्रॉपिंग सिस्टम
19
Aug

वर्षा जल की पोषक़ तत्त्वों की आपूर्ति क्षमता

वर्षा जल की पोषक़ तत्त्वों की आपूर्ति क्षमता

1. वायुमंडलीय स्रोतों, जैसे वर्षा/धूल से पोषक तत्त्वों का योगदान कम इनपुट वाले टिकाऊ प्रणाली वाले कृषि (LISA) में अहम होता है।

2. वर्षा जल से प्रति वर्ष प्रति हेक्टेयर 5-10 kg N की प्राप्ति होती है जो नाइट्रेट के रूप में रहते हैं, तथा कुछ मात्रा में S (10-12 kg SO4 ha-1) की भी आपूर्ति होती है।

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DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. XXX, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर तथा महेन्दर कुमार, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
19
Aug

सिंचाई जल की पोषक तत्त्वों की आपूर्ति क्षमता

सिंचाई जल की पोषक तत्त्वों की आपूर्ति क्षमता

1. गाद से भरे सिंचाई जल कई बार N, K इत्यादि जैसे तत्त्वों के लिए अच्छा स्रोत साबित होते हैं।

2. यदि हम यह मानें कि सिंचित चावल फ़सल औसतन 100 दिनों की अवधि में 1000 mm का उपयोग करती है, तब कुल 104 M3 जल का इस्तेमाल होता है, जो प्रति 1 ppm पोषण सांद्रता के लिए 10kg पोषक तत्त्व प्रदान करता है।

3. गाद (0.1 - 0.2%) वाले सिंचाई जल में खास कर जो बरसात के मौसम में होता है, N तथा K का 5 ppm शामिल रहता है, जो प्रत्येक फ़सल मौसम में लगभग 50kg मात्रा का योगदान देता है।

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DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
19
Aug

गैर-कटाई वाले फ़सल अवशिष्टों की पोषक तत्त्व आपूर्ति की क्षमता

गैर-कटाई वाले फ़सल अवशिष्टों की पोषक तत्त्व आपूर्ति की क्षमता

1. बिना कटे हुए फ़सल अवशेषों (जड़ तथा ठूंठ) को भी उनमें मौजूद रासायनिक संघठन के आधार पर शामिल करना चाहिए।

2. चावल के पुआल के लिए यह मात्रा होती है- 0.5% N, 0.1% P तथा 1.5% K. अज्ञात संघटन वाले अवशेषों के लिए औसत स्तर 0.5% N, 0.2% P तथा 0.5% K माना जा सकता है।

3. चावल की कटाई जब जमीन के पास से की जाती है और केवल ठूंठ और जड़ें छूटती हैं, तब उनकी मात्रा को मोटे तौर से कुल भूमि बायोमास का 10% माना जा सकता है।

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DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
19
Aug

मृदा की पोषक तत्त्वों की आपूर्ति की क्षमता। Nutrient supplying

मृदा की पोषक तत्त्वों की आपूर्ति की क्षमता। Nutrient supplying

1. मृदा की पोषक तत्त्वों की आपूर्ति क्षमता को मृदा/जल विश्लेषण/या पोषण अंतर्ग्रहण से या पोषक रहित प्लॉट (उर्वरक रहित) में दाना की उपज की माप से निर्धारित किया जाता है।

2. चावल के संदर्भ में दानों की उपज वाली जांच को सही माना जाता है, क्योंकि जलजमाव की स्थिति में N तथा P कई बार अपनी वास्तविक स्थिति को नहीं प्रदर्शित करते।

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DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
19
Aug

SSINM का व्यवहार

SSINM का व्यवहार

1. स्थल विशिष्ट INM से किसी स्थान विशेष तथा खास मौसम में फ़सल की जरूरत की पूर्ति के अनुरूप पौधे के पोषक तत्त्वों के समायोजन में सर्वाधिक सहायता मिलती है।

2. इसके तहत बाहर से दिए जाने वाले अजैविक उर्वरकों (N, P, K तथा Zn) के साथ ही मृदा से मिलने वाले मौजूदा देशी पोषक स्रोत का उपयोग, फ़सल अवशेष, जैविक खाद, हरा खाद, जैव-उर्वरक इत्यादि का आदर्श इस्तेमाल किया जाता है।

3. उर्वरकों का अनुप्रयोग स्थान/मौसम के हिसाब से सही तरीके से किया जाता है, जो फ़सल की जरूरत पर आधारित होता है।

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DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
19
Aug

INM की हानियां

INM की हानियां

1. भारी प्रकृति के होने के कारण जैविक पोषक तत्त्व के स्रोतों को आवश्यक मात्रा में निर्मित करने या संघटित करना कठिन हो जाता है।

2. औद्योगिक नाइट्रोजन पर उच्च अनुदान तथा श्रम के लिए उच्च अवसर मूल्यों के कारण जैविक N के यूनिट लागत को महंगा बनाता है।

3. रबी फसल के आरंभिक अवधि में काफी कम तापमान होने की स्थिति में हरे/जैविक खादों की वृद्धि तथा अपघटन में सहायता नहीं मिलती। काफी उच्च तापमान से भी मिट्टी के तीव्र क्रियाकलापों के कारण मिट्टी के जैविक पदार्थों का निर्माण कम हो जाता है।

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19
Aug

INM के लाभ

INM के लाभ

1. INM के तहत सभी पोषक स्रोतों का प्रबंधन, खासकर ऑन-फार्म तथा अजैविक उर्वरकों के साथ जैविक खाद, हरा खाद, फ़सल अवशेष, जैविक-उर्वरक, सस्ते पोषक लवण इत्यादि जैसे सस्ते पोषण आपूर्ति शामिल रहते हैं।

2. इन दोनों (जैविक तथा अजैविक) पोषक तत्त्वों के विवेकपूर्ण उपयोग से दोनों की स्रोतों के दक्षतापूर्ण उपयोग में वृद्धि होती है, क्योंकि प्राइमिंग इफेक्ट के कारण जैविक स्रोत का अधिक लवणीकरण होता है तथा जैविक पदार्थों की मौजूदगी के कारण खासकर N उर्वरक की असंघटन होता है।

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19
Aug

IPM का प्रभाव (समेकित पीड़क प्रबंधन)

IPM का प्रभाव (समेकित पीड़क प्रबंधन)

1. IPM विधि जैविक/पारंपरिक पद्धतियों के साथ पीड़कनाशियों के विविकपूर्ण/ न्यायपूर्ण प्रबंधन पर जोर डालता है, इस प्रकार यह INM ( समेकित पोषण प्रबंधन ) का पूरक होता है।

2. प्रतिरोधी/सहनशील किस्मों/जैविक नियंत्रण के प्रयोग तथा रसायनों की जरूरत आधारित अनुप्रयोग ऐसी लोकप्रिय IPM पद्धतियां हैं, जो पोषक तत्त्वों के उपयोग को दक्ष बनाती हैं।

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