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Rice Soils

Rice Soils
20
Aug

H2S विषाक्तता के कारण

H2S विषाक्तता के कारण

1. सामान्यतः जल से भरे खेत में H2S की विषाक्तता विरले देखी जाती है क्योंकि हमारी मिट्टियां फेरस आयरन से भरपूर होती हैं जो अघुलनशील FeS का निर्माण करता है, और इस प्रकार H2S के निर्माण की संभावना को कम करता है।

2. यह कुछ पट्टियों में उभर सकता है, जब उस स्थान में Fe मात्रा को बढ़ाने के लिए उच्च मात्रा में कार्बनिक पदार्थ डाले जाते हैं।

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DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
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20
Aug

सल्फाइड विषाक्तता (H2S) > 0.07mg l-1) तथा H2S विषाक्तता के लक्षण

सल्फाइड विषाक्तता (H2S) > 0.07mg l-1) तथा H2S विषाक्तता के लक्षण

1. नई पत्तियों के अंतर-शिरीय क्लोरोसिस वाले भूरे धब्बे, जो Fe की कमी से मेल खाते हैं।

2. छिटपुट तथा काली जड़ें।

3. ताजा उखाड़े पौधे से सड़े अंडे जैसी दुर्गंध।

4. H2S, एक श्वसन विष होता है इसलिए यह पौधे के श्वसन प्रणाली को विपरीत रूप से प्रभावित करता है।

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20
Aug

सल्फर (S) की कमी का प्रबंधन

सल्फर (S) की कमी का प्रबंधन

1. INM के हिस्से के रूप में सल्फर (S) युक्त पदार्थों, जैसे जिप्सम, फॉस्फोजिप्सम, पाइराइट्स, ऑर्गेनिक खाद तथा फ़सल अवशेषों का इस्तेमाल।

2. सल्फर (S) की कमी में सुधार लाने के लिए खेतों में समुचित जल-निकास की व्यवस्था होनी चाहिए।

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20
Aug

सल्फर की कमी के कारण

सल्फर की कमी के कारण

1. उच्च फ़सल तीव्रता।

2. उच्च वर्षा से निक्षालन द्वारा उत्पन्न सल्फर (S)o 4 –2 की हानि।

3. यूरिया, डीएपी तथा एमओपी जैसे सल्फर मुक्त उर्वरकों का प्रयोग।

4. कार्बनिक/फ़सल अवशेषों का कम उपयोग।

5. मिट्टी की गहन कमी, जिससे सल्फर (S) का Fe तथा Zn के सल्फाइड के रूप में अवक्षेपण।

6. ग्रामीण / गैर-औद्योगिक /इनलैंड (गैर-तटीय) क्षेत्रों में, जहां के वातावरण में सल्फर (S)O2 की निम्न मात्रा होती है।

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20
Aug

सल्फर की कमी के लक्षण

सल्फर की कमी के लक्षण

1. सल्फर (S) की कमी के लक्षण N के लक्षण (बाधित वृद्धि / संकुचित टिलरिंग / पीलापन) से मेल खाते हैं।

2. एक अहम अंतर यह है कि सल्फर (S) की कमी सबसे पहले नई पत्तियों में दिखाई पड़ते हैं। जबकि नाइट्रोइजन की कमी के लक्षण की स्थिति में यह पुरानी पत्तियों में सबसे पहले दिखाई पड़ती है।

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20
Aug

सल्फर (S)

सल्फर (S)

1. सल्फर (S) उच्च pH वाली मिट्टी में खासकर मिट्टी की अम्लीयता को बदलकर रोग की संभावना को कम करता है।

2. निम्नीकृत मिट्टियों में (निम्न Fe) जहां H2 सल्फर (S) का सामान्य निर्माण होता है, ब्राउन लीफ स्पॉट तथा ऐकिनोची रोग का गंभीर संक्रमण होता है।

3. पत्तियों पर प्रयोग करने से सल्फर (S) तत्त्व कवक रोग से पौधे का बचाव करता है।

सल्फर के कार्य

1. सल्फर (S) सिस्टीन, मेथियॉनिन जैसे एमीनो अम्ल का घटक होता है और इसलिए यह प्रोटीन का भी एक अहम घटक होता है।

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20
Aug

कैल्शियम (Ca) की कमी के कारण, प्रबंधन

कैल्शियम (Ca) की कमी के कारण

1. निम्न मात्रा में उपलब्ध कैल्शियम (Ca) (मोटी संरचना वाली मिट्टी).

2. निम्न pH (जलोढ़ मिट्टी/ अम्लीय सल्फेट मिट्टी, जिसका pH <5.0 हो)

3. उच्च pH (सॉडिक मिट्टी, जिसकी pH > 10 हो).

4. अत्यधिक P अनुप्रयोग।

कैल्शियम (Ca) की कमी का प्रबंधन

1. उच्चभूमि वाली मिट्टी में लाइम का @ 0.5-1.5 t/ha तथा सॉडिक मिट्टी में जिप्सम का 4-5 t ha-1 का प्रयोग किया जाना चाहिए।

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कैल्शियम (Ca) की कमी के लक्षण

कैल्शियम (Ca) की कमी के लक्षण

1. अत्यधिक अम्लीय/सॉडिक मिट्टी में कैल्शियम की कमी काफी विरले देखी जाती है।

2. यह छोटी पत्तियों के रंग फीका करता है तथा पत्तियों के शिखों को विकृत (लुंठित/वक्र) करता है।

3. Al विषाक्तता के कारण यह जड़ प्रणाली की वृद्धि को रोकता है।

4. परिणामस्वरूप, उच्च भूमि वाली अम्लीय मिट्टी में फ़सल सूखे से प्रभावित हो जाती है।

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कैल्शियम (Ca) के कार्य

कैल्शियम (Ca) के कार्य

1. कैल्शियम (Ca) कोशिका दीर्घीकरण तथा विभाजन के लिए आवश्यक होता है, क्योंकि यह मध्य लैमेला का एक घटक होता है।

2. यह कोशिका झिल्ली की अखंडता को बनाए रखता है तथा कोशिका से प्लांट मेटाबोलाइट्स के लीकेज को रोकता है, जिससे श्वसन दर की वृद्धि होती है।

3. चावल के दाने में ऐल्युरोन स्तर में अल्फा ऐमाइलेज संश्लेषण के जरिए एक अहम भूमिका निभाता है। ऐल्युरोन स्तर बीज के अंकुरण के दौरान स्टार्च मेटाबोलिज्म को बढ़ावा देता है।

4. सर्वाधिक ज्ञात प्राकृतिक वनस्पति वृद्धि रेगुलेटर के कार्य में यह द्वितीयक संदेशवाहक के रूप में कार्य करता है।

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20
Aug

कैल्शियम (Ca)

कैल्शियम (Ca)

1. पौधों में रोगों के विकास के लिहाज से Ca पर सबसे अधिक अध्ययन किया आवश्यक तत्त्व माना जाता है।

2. Ca रोगों के प्रति प्रतिरोध को बढ़ा सकता है तथा रोगाणुओं की उग्रता में वृद्धि की स्थिति में इसे घटा भी सकता है। पौधों के हिस्सों में Ca का प्रभाव Ca पेक्टेट के जमाव से कोशिका भित्ति की मजबूती के कारण उत्पन्न होता है।

3. Ca परपोषी कवक/बैक्टीरिया द्वारा निर्मित पॉलीगैलेक्टोरीनेज जैसे पेक्टोलाइटिक एंजाइम को बाधित करता है। ये एंजाइम पोषक पौधे के ऊतक पर हमले के दौरान मध्य लेमेला को घुलाने के लिए निर्मित होते हैं।

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Aug

K की कमी का प्रबंधन

K की कमी का प्रबंधन

1. K (40-60 kg ha-1) की समुचित मात्रा का प्रयोग।

2. चावल की किस्मों/हाइब्रिड/मोटी संरचना वाली रेतीली मिट्टी के लिए डाले हुए K (2-3 times) का स्प्लिट अनुप्रयोग करना चाहिए।

3. चावल के पुआल में 1.5 –2.5 % जल घुलनशील K (आयनिक रूप में) मौजूद होता है, जो गहन रूप से खेती वाले खेत में K की मात्रा को बनाए रखने का एक अहम स्रोत होता है।

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20
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K की कमी के कारण

K की कमी के कारण

1. निम्न CEC /उच्च अंतःश्रवण वाली मोटी संरचना की मिट्टी में निक्षालन हानि होती है।

2. मिट्टी का निम्न pH (लैटेराइट / अम्ल सल्फेट वाली मिट्टी जिसमें थोड़ा या आधार संतृप्तता बनी रहे।)

3. पूर्ण कटाई/पुआल को हटाया जाना

4. उच्च फ़सल तीव्रता (मिट्टी की खुदाई)

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K की कमी के लक्षण

K की कमी के लक्षण

1. K की कमी के लक्षण सबसे पहले पुरानी पत्तियों पर दिखाई पड़ते हैं। क्लोरोसिसि तथा नेक्रोसिस पत्तियों के किनारे तथा टिप्स पर आरंभ होकर नीचे की ओर फैलते हैं।

2. यह कई बार बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट रोग के लक्षणों के दिखाई पड़ते हैं (K के लक्षण एकसमान रूप से उभरते हैं, जबकि रोग के लक्षण पट्टियों में दिखाई पड़ते हैं।)

3. K की कमी वाले पौधों में कम लिग्नीफिकेशन होता है, इसलिए ये आसानी से कवक के हमलों का शिकार हो जाते हैं।

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पोटैशियम (K ) - K के कार्य

पोटैशियम (K ) - K के कार्य

1. K किसी भी वनस्पति-हिस्से का घटन नहीं होता। फिर भी यह अपने कमाल के आयनिक कार्यों के कारण अहम माना जाता है।

2. K परासरणीय विभव (केटायन का संतुलन) उत्पन्न करता है

3. कई एंजाइम के लिए (लगभग 60 के लिए) सक्रिय एजेंट के रूप में कार्य करने के कारण, यह सरल शर्करा को बहुलीकरण द्वारा जटिल अणु सेलुलोज/स्टार्च/लिग्निन तथा एमीनो अम्ल को प्रोटीन में बदलता है।

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P की कमी का प्रबंधन

P की कमी का प्रबंधन

1. सामान्यतः जल-जमाव वाली मिट्टी में P की पर्याप्त मात्रा मौजूर रहती है, क्योंकि इससे P की उपलब्धता बढ़ जाती है।

2. बेहतर फ़सल के लिए P @ 30-40 kg P2O5/ha खरीफ के लिए तथा 60 – 80 kg P2O5/ha रबी फ़सल (निम्न तापमान) के लिए प्रतिरोपण से पहले आधारी ख़ुराक के रूप में डालें।

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P की कमी के कारण

P की कमी के कारण

1. मिट्टी में P की कम मात्रा (मोटी संरचना वाली मिट्टी जिसमें SOM की कम मात्रा रहती है)।

2. Al तथा Fe द्वारा P का उच्च स्थिरिकरण (अम्लीय मिट्टी) तथा Ca द्वारा उच्च स्थितिरिकरण (कैल्सेरस / क्षारीय मिट्टी).

3. अपर्याप्त जलजमाव (उच्च भूमि में / ऐरोबिक स्थिति /नई सिंचित अवस्थाओं में).

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P की कमी के लक्षण

P की कमी के लक्षण

1. गतिशील होने के कारण N की कमी के लक्षण सबसे पहले पुरानी पत्तियों में दिखाई पड़ते हैं।

2. प्ररोह तथा मूल दोनों की वृद्धि प्रभावित होती है।

3. प्रभावित पौधे टिलर्स की कम संख्या प्रदर्शित करते हैं।

4. P की कमी वाले पौधे में पत्तियां छोटी होती हैं, वे सीधी रहती हैं, जिनपर गहरे हरे तथा लाल-बैंगली वाले वर्णक दिखाई पड़ते हैं (ऐंथोसाइनिन वर्णक का जमाव)।

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फॉसफोरस (P) - P के कार्य

फॉसफोरस (P) - P के कार्य

1. पौधे में P कार्बनिक (DNA/ RNA – कोशिका झिल्ली में फॉस्फोलिपिड) तथा अकार्बनिक (ATP तथा पाइरोफॉस्फेट बंध) के रूप में मौजूद रहता है।

2. P क्लोरोप्लास्ट से ट्रायोज फॉस्फेट के रूप में स्टार्च को कोशिका में भेजने की भूमिका निभाता है।

3. P भंडारण यौगिक जैसे दानों के फाइटिन में मौजूद रहता है, जो बीजों के अंकुरण के दौरान झिल्ली तथा अन्य कोशिकीय घटकों के निर्माण में मदद करता है।

4. फाइटिन में Zn तथा Fe के प्रति उच्च अनुराग रहता है तथा मानव के पोषण के लिहाज से अधिक अहम माना जाता है।

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Aug

N की कमी का प्रबंधन

N की कमी का प्रबंधन

1. चावल के पौधे की N आवश्यकता उनकी किस्मों, हाइब्रिड प्रजातियों तथा मिट्टी पर निर्भर करती है।

2. किस्मों की अवधि के आधार तथा मिट्टी के प्रकार पर N उर्वरक को 2-4 के बराबर भाग में बांट कर तथा @ 40-80 kg N ha-1 गीले मौसम में (ख़रीफ) तथा 100-150 kg N ha-1 सूखे मौसम में (रबी /बोरो) खेत से जल निकास के बाद।

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N की कमी के कारण

N की कमी के कारण

1. मिट्टी में N पदार्थों की कम मात्रा (बलुई /खुरदरी संरचना वाली मिट्टी जिनमें SOM की कम मात्रा मौजूद रहती है)।

2. N उर्वरक उपयोग दक्षता (खेत से खेत में सिंचाई / सॉडिसिटी – वोल्टालाइजेशन / उच्च निक्षालन / ठहरे जल में N की टॉप ड्रेसिंग से विनाइट्रीकरण उत्पन्न होता है।)

3. अकार्बनिक/कार्बनिक खादों का अपर्याप्त प्रयोग।

4. फ़सल चक्रण में लेग्यूम को शामिल नहीं करना (चावल मोनोकल्चर)।

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