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Rice Soils

Rice Soils
24
Sep

Mo की कमी के लक्षण, कारण

1.N की कमी से मिलते-जुलते हैं (पुरानी पत्तियां क्लोरोटिक हो जाती हैं)।

2. इसके अलावा  NO3 जमाव के कारण पत्तियों के किनारे पर नेक्रोटिक स्पॉट भी दिखाई पड़ता है। 

Mo  की कमी के कारण:

1.Mo.की कम मात्रा वाली मूल मिट्टी से खेती योग्य मिट्टी का निर्माण। 

2. निम्न मृदा pH (Fe ऑक्साइड तथा हाइड्रॉक्साइड के कारण)। Mo एकमात्र ऐसा माइक्रोन्युट्रिएंट हैं, जिसकी उपलब्धता सामान्यतः pH के बढ़ने से बढ़ती है। 

File Courtesy: 
DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
24
Sep

मॉलिब्डेनम (Mo) - Mo के कार्य

1.Mo मिट्टी में सबसे कम मात्रा में पाया जाता है। 

2. यह नाइट्रेट रिडक्टेज का एक घटक होता है जिसका उच्च भूमि के N03 –N में अहम भूमिका होती है। 

3. इसमें डाइ-नाइट्रोज्नाइज एंजाइम (N फिक्सर तथा लेग्यूम) होता है। 

4.Mo युक्त अन्य एंजाइम हैं- सल्फाइटीकोक्साइड/जेंथाइन ऑक्सिडेज/डिहाइरोजेनेज। 

 

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DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
24
Sep

Cu की विषाक्तता के कारण,लक्षण & प्रबंधन

1. प्राकृतिक रूप से Cu की विषाक्तता काफी विरले देखने में आता है और यह Cu खनन क्षेत्र में पाई जाती है। 

2. यह ऐसे कृषि खेतों में भी पाई जा सकती है, जहां Cu की अधिक मात्रा की प्राप्ति होती है, जो कवकनाशी/ कीटनाशी / वाइनयार्ड में कवकनाशियों के रूप में प्राप्त होता है। 

Cu की विषाक्तता के लक्षण:

1. यह Fe की कमी (क्लोरोसिस) से मेल खाता है, क्योंकि Cu की विषाक्तता सामान्यतः Fe की भी कमी दिखाता है।

 Cu की विषाक्तता के प्रबंधन:

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Sep

Cu की कमी का प्रबंधन

1. अम्लीय मिट्टी के अतिरिक्त चूनाकरण से बचें। 

2.Cu की कमी वाली मिट्टियों में 3 साल के अंतराल पर 10-20 kg CuSO4/ha (25% Cu) की सलाह दी जाती है। इसके अलावा CuO (60-80% Cu), Cu फ्रिट्स (3.7%) तथा Cu चीलेट्स (Cu EDTA) का इस्तेमाल चावल पर सफलतापूर्वक किया गया है। 

3.1% CuSO4 में बिचड़े की जड़ को 1 घंटे तक उपचारित करने की अनुशंसा के जाती है। 

4. 0.1 से 0.2% CuSO4 का फोलियर स्प्रे का भी सुझाव दिया जाता है। 

5.  केरल में चावल की फ़सल के लिए बीजों को 24 घटों तक 0.25% CuSO4 में भिगोएं। 

 

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Cu की कमी के कारण

1. उच्च कार्बनिक पदार्थों के कॉम्प्लेक्स वाली मिट्टी  Cu की कमी

(पीटी मिट्टी, हिस्टोसोल-एक्लामेशन रोग) पैदा करती है।

2. हल्की संरचना वाली बलुई मिट्टी तथा उच्च ऋतुक्षरण वाली अम्लीय मिट्टी (सामान्यतः केरल मे%) में इसकी कमी पाई जाती है। 

3. जलमग्नावस्था( Cu S जैसे अघुलनशील यौगिकों का निर्माण) 

4. अम्लीय चट्टानों (आग्नेय) से व्युत्पन्न मिट्टी। अम्लीय मिट्टी का अधिक चूनाकरण। 

5.NP K तथा Zn के अत्यधिक इस्तेमाल से मृदा खनन के कारण Cu की कमी होती है।

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Sep

Cu की कमी के लक्षण

1. मध्य शिरा के दोनों ओर क्लोरोटिक लकीर, जिसए बाद पत्ती के

शिखाग्र पर नेक्रोटिक क्षेत्र उभर आते हैं। 

2. कमी वाली पत्तियां नीली-हरी दिखाई पड़ती हैं।  

3. नई पत्तियां अनरोल नहीं होतीं।  

4. पत्तियां के शिखाग्र सूई की तरह दिखाई पड़ते हैं।    

5. शूकियों की उच्च अनुर्वरता। 

6. अपर्याप्त लिग्निन संश्लेषण के कारण लॉजिंग की संभावना बनी रहती है। 

 

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Sep

तांबा (Cu)- के कार्य

1. फोटो सिस्टम  I (PS I) में फोटोसायनिन का एक अवयव होने के कारण Cu इलेक्ट्रॉन के परिवहन (प्रकाश-संश्लेषण) में शामिल रहता है। 

2. आण्विक ऑक्सीजन के साथ (साइटोक्रोम a 3 के भाग के रूप में) टर्मिनल ऑक्सीडेशन को उत्प्रेरित करता है। 

3. फेनोलोक्सिडेज के एक को-फेक्टर के रूप में यह टायरोसिन, क्विनिन, फायटोऐलेक्सिन, लिग्निन (रोगाणु के ख़िलाफ प्रतिरक्षा) में शामिल रहता है।

4. यह बीज निर्माण में भूमिका निभाता है, क्योंकि यह उपयुक्त पराग के निर्माण में मदद करता है। 

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Sep

B की विषाक्तता के कारण

1. निर्जल तथा अर्ध-निर्जल जलवायु में तेल (उच्च वाष्पण तथा निम्न निक्षालन के कारण अत्यधिक जमाव)   

2.B से भरपूर सिंचित जल /सीवेज जल का सिंचाई के लिए इस्तेमाल।

3.B से युक्त मूल मिट्टी (समुद्री मिट्टी).

4. नागरिक कचरों (कम्पोस्ट) का अत्यधिक इस्तेमाल 

5. तटीय नमकीन मिट्टियां 

 

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Sep

B की विषाक्तता के लक्षण

1. पुरानी पत्तियों की टिप्स तथा किनारों पर अंतरशिरीय क्लोरोसिस।

2. आगे चलकर गहरे भूरे तथा नेकरोटिक स्पॉट (पीआइ अवस्था), जो भूरा होकर सूख जाता है।

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DRR SSINM
24
Sep

B की कमी का प्रबंधन

1. 10 से 15 kg ha-1 बोरेट उर्वरक (Na2 B4 O75 H20) 14% B के साथ मिट्टी में डालना चाहिए, जिससे मोटी संरचना वाली मिट्टी में रोपण के समय आधारी प्रयोग के रूप में लगभग 1.5 –2.0 kg B /ha की आपूर्ति होती है। 

2. बोरेक्स को अमोनियम उर्वरकों के साथ मिश्रित नहीं करना चाहिए, जिससे  NH3 का वोलाटाइजेशन पैदा होता है। 

3. बोरोसिलिकेट ग्लास फ्रिट्स का भी इस्तेमाल करना चाहिए। 

4. 0.1-0.25% बोरिक अम्ल / सोडियम बोरेट के फॉलियर स्प्रे का भी इस्तेमाल करना चाहिए। 

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Sep

B की कमी के कारण

1. अत्यंत ऋतुक्षरित अम्लीय उच्च भूमि की मिट्टियां (उच्च Al) तथा मोटी संरचना वाली बलुई मिट्टी। 

2. यह गर्मियों के मौसम में उत्पन्न होता है (नमी की कमी के कारण) तथा सूखी मिट्टी (सूखा) में सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों के कम होने से पैदा होती है। 

3. मोटी संरचना वाली मिट्टियों में उच्च वर्षा के कारण होने वाले निक्षालन के कारण भी की कमी पैदा होती है। ऐसा  B जो मिट्टी के घोल में नॉनियोनाइज्ड अणु के रूप में पाया जाता है, जलमग्न मिट्टी में अधिक गतिशील होता है। 

4. च्च मृदा pH (नमकीन सॉडिक मिट्टियां)।

5. निम्न कार्बनिक पदार्थों वाली मिट्टी। 

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Sep

B की कमी के कारण

1. अत्यंत ऋतुक्षरित अम्लीय उच्च भूमि की मिट्टियां (उच्च Al) तथा मोटी संरचना वाली बलुई मिट्टी। 

2. यह गर्मियों के मौसम में उत्पन्न होता है (नमी की कमी के कारण) तथा सूखी मिट्टी (सूखा) में सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों के कम होने से पैदा होती है। 

3. मोटी संरचना वाली मिट्टियों में उच्च वर्षा के कारण होने वाले निक्षालन के कारण भी की कमी पैदा होती है। ऐसा  B जो मिट्टी के घोल में नॉनियोनाइज्ड अणु के रूप में पाया जाता है, जलमग्न मिट्टी में अधिक गतिशील होता है। 

4. उच्च मृदा pH (नमकीन सॉडिक मिट्टियां)।

5. निम्न कार्बनिक पदार्थों वाली मिट्टी। 

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B की कमी के लक्षण

1. प्रभावित पौधे की ऊंचाई कम रहती है तथा नई पत्तियों के शिखाग्र  Ca की कमी की स्थिति की तरह ही लिपटे होते हैं और गंभीर कमी की स्थिति में पौधा सूख जाता है।  

2. परागनली की वृद्धि/निषेचन की कमी (अनाज की घटी हुई संख्या) के कारण बढ़ी हुई अनुर्वरता।

3.B की कमी यदि गंभीर हो, तो चावल का पौधा पुष्प-गुच्छ उत्पन्न करने में असफल हो सकता है। 

 

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बोरॉन (B)

1.B की आवश्यकता लिग्निन, सायनीडिन (ल्यूको सायनीडिन)/पॉलीफेनॉल्स के संश्लेषण में होती है तथा इसके आदर्श इस्तेमाल से पौधे में कवकों (विल्ट्स/ रस्ट) के प्रति तथा वायरल रोगों से बचाव होता है। 

2.B के समुचित इस्तेमाल से भी कीटों से बचाव में मदद मिलती है। 

 

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B के कार्य

1. संवहनी ऊतक (फ्लोएम/ जाइलम) के विकास में आवश्यक। 

2. कॉम्लेक्सेज के निर्माण के जरिए कार्बोहाइड्रेट के परिवहन को बढ़ावा देना। 

3. सुक्रोज के संश्लेषण में प्रत्यक्ष रूप से शामिल रहता है। 

4. पौधों की प्रतिरक्षी प्रणाली में कार्य करता है, क्योंकि यह लिग्निन, शिकिमेट मार्ग के जरिए फाइटोऐलेक्सिन्स के जैव-संश्लेषण में भाग लेता है। 

5. पराग के अंकुरण/निषेचन में मदद करता है और इस प्रकार दाने/पुष्प-गुच्छ की संख्या में वृद्धि करता है।  

6. कोशिका भित्ति का संश्लेषण तथा लिग्नीफिकेशन में भूमिका निभाता है। 

 

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Sep

Mn विषाक्तता का प्रबंधन

1. जहां कहीं भी संभव हो मध्य मौसम के जल निकास की व्यवस्था करना। 

2. पुआल /राख के इस्तेमाल के जरिए Si तथा K की आपूर्ति करना।

3. बेसिक स्लैग @ 1.5 - 5.0 t ha-1 के इस्तेमाल से Si पोषण में सुधार लाना जो Mn विषाक्तता को कम करता है। 

4. चूने के साथ उर्वरकों का संतुलित इस्तेमाल करना (NPK + कूना @ 1-2 t ha-1) – जिससे पोषण की कमी से बचा जा सके। 

 

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Sep

Mn विषाक्तता के कारण

1. काफी क्षीण निम्न भूमि मृदा जिसका अम्लीय pH (< 5.5) हो। 

2. अम्ल सल्फेट मिट्टियां 

3.Mn के खनन से प्रभावित (प्रदूषित) क्षेत्र, Mn पदार्थ वाले औद्योगिक कचरे। 

 

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Mn विषाक्तता के लक्षण

1. निचले पत्र फलक तथा आवरण पर भूरे धब्बे का उभरना। 

2. दो महीने पुरानी फ़सल में पत्तियों की टिप्स का सूखना।

3.Fe की कमी की तरह ही नई पत्तियों में क्लोरोसिस।

4 .उच्च शूकि अनुर्वरता। 

 

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Sep

Mn की कमी का प्रबंधन

1.5 –10 kg ha-1 Mn का MnSO4 (25-30% Mn) के जरिए मृदा अनुप्रयोग की सलाह दी जाती है। MnSO4 का स्रोत चूंकि MnO2 (40% Mn) तथा MnCO3 (31% Mn) की तुलना में अधिक तीव्रता से कार्य करता है, इसलिए इसकी कमी वाली मिट्टी में इसका प्रयोग करना चाहिए। 

2. तीव्र रिकवरी के लिए 0.2 से 0.5 % MnSO4 का पत्र छिड़काव करना चाहिए, जो टिलरिंग की अवस्था से आरंभ किया जाना चाहिए। कई बार 3-4 दिनों के अंतराल पर बहु-अनुप्रयोग (तीन बार) की आवश्यकता पड़ती है।  

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Sep

Mn की कमी के कारण

1. मिट्टी में Mn सामग्री की कम उपलब्धता (वर्षापूरित उच्च भूमि की चावल वाली मिट्टी)।

2. अत्यधिक Fe सामग्री (अपघटित /अम्ल सल्फेट वाली मिट्टी).

3. निक्षालित गैर-जलमग्न बलुई मिट्टी (पंजाब में खरीफ चावल के मौसम में अत्यधिक निक्षालन के कारण Mn की कमी से गेहूं को काफी नुकसान पहुंचता है।)

4. अत्यधिक ऋतुक्षरित अम्लीय उच्च भूमि की मिट्टियां (जलोढ़  मिट्टी)।

5. कार्बनिक मिट्टियां (पीट / हिस्टोसोल्स), अम्लीय मिट्टियों का अत्यधिक चूनाकरण।

6.NO3 –N, Ca, Mg तथा Zn का उच्च सांद्रण। 

 

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