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Diseases

Diseases
6
Sep

नैरो ब्राउन स्पॉट का आर्थिक महत्व

नैरो ब्राउन स्पॉट रोग का आर्थिक महत्व

1. गभीर संक्रमण की स्थिति में नैरो ब्राउन स्पॉट रोग पत्तियों तथा पत्ती आवरण को समय से पहले मृत कर डालता है, साथ ही यह गूदे समय से पहले पकाता है।

2. दाने के रंग के बदरंग होने के कारण यह अनाज की कीमत को मंदा करता है तथा मिल में भी दाने की क्षति होती है।

3. वर्ष 1953 तथा 1954 के दौरान सुरीनाम में इस रोग के फैलने से उपज में 40% की हानि हुई थी।

File Courtesy: 
http://www.knowledgebank.irri.org/ricedoctor/ind ex.php?option=com_सामग्री &view=article&id=5 60&Itemid=2765
6
Sep

नैरो ब्राउन स्पॉट का वितरण तथा मौजूदगी

1. नैरो ब्राउन स्पॉट रोग एशिया, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, तथा पापुआ न्यूगिनी के देशों में पाया गया है।   

2. यह रोग पोटैशियम की कमी वाले खेत में उगी धान की फ़सलों पर पाया जाता है।  

3. इस रोग के विकास के लिए 25 से लेकर 28 डिग्री से. का तापमान अनुकूल पाया गया है। 

4. इस रोग का विकास चावल की प्रजातियों की कवक के प्रति संवेदनशीलता पर निर्भर करता है। 

 

File Courtesy: 
http://www.knowledgebank.irri.org/ricedoctor/index .php?option=com_सामग्री &view=article&id=560& Itemid=2765
6
Sep

नैरो ब्राउन स्पॉट ( Cercospora janseana)

1. नैरो ब्राउन स्पॉट रोग की गंभीरता हर साल अलग-अलग रहती है। 

2. यह तब काफी गंभीर होता है, जब पौधा परिपक्वता प्राप्त करता है, जिससे समय से पूर्व दाने पक जाते हैं और उपज में कमी आती है। 

3. लीफ स्पॉट 1/10 से ½ इंच लंबे होते हैं, जो 1/32 इंच संकरे और दालचीनी-भूरे रंग के होते हैं। 

4. गंभीर स्थितियों में समय से पूर्व पत्ती की मृत्यु हो जाती है। आरंभिक परिपक्वता वाली किस्मों में इस रोग का बड़ा प्रभाव नहीं होता। 

 

File Courtesy: 
http://165.91.154.132/Texlab/Grains/Rice/ricenbls.html
6
Sep

लीफ स्काल्ड के प्रबंधन के विकल्प

लीफ स्काल्ड को कई विधियों से नियंत्रित किया जा सकता है, जो हैं: 

1. एकमात्र पारंपरिक विधि यह है कि उच्च मात्रा में उर्वरक के इस्तेमाल से बचना चाहिए। 

2. भारत में कुछ किस्म ऐसे हैं जो इस रोग के प्रति प्रतिरोधी होते हैं। 

3. बेनोमाइल, कार्बेंडाजिम, किटोजीन तथा थायोफैनेट-मीथाइल जैसे रसायनों का इस्तेमाल इस रोग से बचने में किया जा सकता है। 

4. खेतों में बेनोमाइल, फेंटीन एसीटेट, एडिफेंफॉस तथा वैलिडामाइसिन के छिड़काव से लीफ स्काल्ड में उल्लेखनीय कमी आती है। 

File Courtesy: 
http://www.knowledgebank.irri.org/ricedo ctor/index.php?option=com_सामग्री &vie w=article&id=559&Itemid=2764
6
Sep

लीफ स्काल्ड के पूर्व प्रवृत्त कारक

लीफ स्काल्ड के पूर्व प्रवृत्त कारक हैं:

1. उच्च नाइट्रोजन

2. गीला मौसम- पौधे के बीच के कम स्थान

3. जख्मी पत्तियां तथा बीज और फ़सल की ठूंठ संक्रमण के स्रोत हैं।

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http://www.knowledgebank.irri.org/ric edoctor/index.php?option=com_cont ent&view=article&id=559&Itemid=2764
6
Sep

लीफ स्काल्ड के लक्षण

 लीफ स्काल्ड के लक्षण

1. पत्तियों के शिख पर या उसके किनारे पर धारीदार जख्मों में पीले-भूरे रंग से लेकर धूसर और लाल-भूरे रंग का एकांतर बैंड होते हैं, जो प्रभावित पत्तियों पर फीते का पैटर्न बनाते हैं। 

2. लीफ स्काल्ड के प्राथमिक लक्षण धारीदार जख्म होते हैं, जो पत्तियों की शिख से लेकर पत्र फलक के किनारे तक फैले होते हैं।  

3. प्रभावित पत्ती का मुख्य किनारा प्रायः पीला हो जाता है, जिसके कारण रोग से गंभीर रूप से प्रभावित खेतों का रंग सोने जैसा दिखने लगता है। 

File Courtesy: 
http://www.knowledgebank.irri.org/ricedoctor/in dex.php?option=com_content &view=article& id=559&Itemid=2764
6
Sep

लीफ स्काल्ड का आर्थिक महत्व

लीफ स्काल्ड का आर्थिक महत्व:

1. भारत तथा बांग्लादेश में इस रोग से होने वाली फ़सल हानि क्रमशः 23.4% तथा 20-30% देखी गई।

2. इस रोग ने लेटिन अमेरिका तथा पश्चिमी एशिया में काफी नुकसान पहुंचाया।

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http://www.knowledgebank.irri.org/ricedoctor /index.php?option=com_content &view=art icle&id=559&Itemid=2764
6
Sep

लीफ स्काल्ड का वितरण तथा मौजूदगी

1. लीफ स्काल्ड रोग अमेरिका तथा पश्चिमी अफ्रीका में देखा गया। 

2. लीफ स्काल्ड लेटिन अमेरिका तथा एशिया के अन्य भागों में व्यापक रूप से पाया जाता है। 

3. लीफ स्काल्ड रोग अपने मौसम में सामान्यतः परिपक्व पत्तियों पर विकसित होता है तथा उसे गीले मौसम, उच्च नाइट्रोजन उर्वरक तथा पौधों के बीच कम स्थान जैसे कारकों से बढ़ावा मिलता है।   

4. कोनाइडल अवस्था के प्रयोग से कृत्रिम इनोकुलेशन के परिणाम ने यह दिखाया को यह रोग जख्मी पत्तियों पर स्वस्थ्य पत्तियों की तुलना में तेजी से विकसित होता है, जिससे यह पता चलता है कि कवक एक कमजोर रोगाणु है।   

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http://www.knowledgebank.irri.org/riced octor/index.php?option=com_सामग्री & view=article&id=559&Itemid=2764
6
Sep

लीफ स्काल्ड का इतिहास

1. आंध्र प्रदेश में लीफ स्काल्ड रोग वर्ष 1981 में रीजनल ऐग्रीकल्चर राइस रिसर्च स्टेशन, नेलोर में देखा गया था।

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http://books.google.co.in/books?id=f8Humn-Y-h cC&pg=PA5&lpg=PA5&dq=leaf+scald+of+rice+in+india &source =bl&ots=xBgL_9qNRn&sig=DQwKh1EGo7iS RT9k99h3u6-3hy4&hl=en&ei=ZIilTOfGHI2OvQO97u WMDQ&sa=X&oi=book_result&ct=result&resnum =4&ved=0CCUQ6AEwAw#v=onepage&q=leaf%20scal d%20of%20rice%20in%20india&f=false
6
Sep

लीफ स्काल्ड का सामान्य रोगाणु

लीफ स्काल्ड का सामान्य रोगाणु है Microdochium oryzae

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6
Sep

शीथ ब्लाइट का पोषक पौधे द्वारा प्रतिरोध

शीथ ब्लाइट का पोषक पौधे द्वारा प्रतिरोध 
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drr ट्रेनिंग मैनुअल
6
Sep

शीथ ब्लाइट का रासायनिक नियंत्रण

 ईथर वैलिडामाइसिन 3 L @ 2.5 ml का छिड़काव, अथवा  

• हेक्साकोनाजोल 5 EC @ 2.0 ml या

• थाइफ्लुजामाइड 24 SC @ 0.75 ml या

• प्रोपिकोनाजोल 25 EC @ 1 ml अथवा 

• थायोफैनेट मिथाइल  70 WP या

 

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DRR मैनुअल
6
Sep

शीथ ब्लाइट का जैव-वैज्ञानिक नियंत्रण

शीथ ब्लाइट का जैव-वैज्ञानिक नियंत्रण

1. प्रतिरोधी सूक्ष्मजीव- फ्लुओर्सेंट बैक्टीरिया को अलग किया गया, जिन्होंने शीथ ब्लाइट रोगाणुओं के ख़िलाफ उच्च स्तर का प्रतिरोध दिखाया।  

2. गाजीपुर में R. oryzae के साथ पूर्व-इनोकुलेशन को अलग किया गया ताकि  R. solani. Compost द्वारा उत्पन्न शीथ ब्लाइट की गंभीरता को कम किया जा सके और साथ ही उपज में वृद्धि की जा सके। 

3. राजशाही (बंगलादेश) में प्रेस मड, आड़े मिल की धूल तथा चावल की भूसी से रोग की गंभीरता कम हुई। 

 

 

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http://www.fao.org/teca/content /validatio n-and-promotion-technologies-rice-she ath-blight-management
6
Sep

शीथ ब्लाइट के नियंत्रण की पारंपरिक पद्धतियां

शीथ ब्लाइट के नियंत्रण की पारंपरिक पद्धतियां :  

1. पौधों के बीच का स्थान कम नहीं रखना चाहिए, अन्यथा घने पौधे या फ़सल इस रोग के क्षैतिक प्रसार के लिए अनुकूल दशा प्रदान करते हैं।  

2. खेतों में नाइट्रोजन फ़र्टिलाइजर का इस्तेमाल जरूरत आधारित या वास्तविक समय या स्प्लिट ऐप्लिकेशन के साथ करना चाहिए, जिसमें इनोकुलम की उच्च मात्रा हो। 

3. साफ-सफाई खासकर खर-पतवार की सफाई से शीथ ब्लाइट के नियंत्रण में मदद मिलती है, क्योंकि रोगाणु धान के खेतों में सामान्य रूप से पए जाने वाले खर-पतवारों पर भी हमले करते हैं। 

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http://www.knowledgebank.irri.org/rice doctor/index.php?option=com_cont ent&view=article&id=565&Itemid=2770
6
Sep

शीथ ब्लाइट का प्रबंधन विकल्प

• शीथ ब्लाइट प्रबंधन विकल्पों में पारंपरिक, जीववैज्ञानिक, रासायनिक तथा प्रतिरोधी किस्मों का इस्तेमाल शामिल है।

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DRR ट्रेनिंग मैनुअल
6
Sep

शीथ ब्लाइट का वैकल्पिक पोषक

 1. इस रोगाणु का व्यापक पोषक रेंज है तथा यह धान के खेत के में बंधे बांधों पर सभी घासों और चौड़ी पत्तियों वाले खर-पतवार पर पाये जाते है व समान लक्षण दिखाते हैं और स्क्लेरोटियल पिंड का निर्माण करते हैं।    

2. ये स्क्लेरोटियल पिंड धान की फ़सल वाले पानी में गिरते हैं और फ़सल में संक्रमण पहुंचाते हैं। 

 

File Courtesy: 
DRR मैनुअल
6
Sep

शीथ ब्लाइट के पूर्व प्रवृत्त कारक

1. आपेक्षिक आर्द्रता तथा तापमान शीथ ब्लाइट संक्रमण के लिए अहम कारक होते हैं।  

2. फ़सल की छत्ती पर पर आर्द्रता 96% के करीब होती है तब रोगाणु फलता-फूलता है। 

3. 100% आपेक्षिक आर्द्रता पर उच्च संक्रमण उत्पन्न होता है तथा आर्द्रता के घटने पर धीरे-धीरे कम हो जाता है। 

4. उच्च तापमान 28-32 डिग्री से. तथा बार-बार होने वाली बरसात से रोग का विकास अधिक होता है। 

5. यह रोग सूखे मौसम की तुलना में बरसात के मौसम में अधिक होता है।   

 

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DRR मैनुअल
6
Sep

शीथ ब्लाइट द्वारा प्रभावित होने वाले पौधे के हिस्से

 1. रोगाणु से रोग का विकास धान के खेत में पानी के स्तर के ठीक ऊपर होता है, जहां यह पौधे के सभी हिस्सों जैसे आवरण, अंतरसंधि, ऊपरी पत्तियां तथा पुष्प-गुच्छों को प्रभावित करता है।  

2. आवरणों पर शीथ ब्लाइट संक्रमण, ग्रहपथाकार/अंडाकार स्पोर का विकास करता है, जो धूसर रंग का होता है।  

3. प्रभावित शीथ की पत्ती सूख जाती है। आर्द्र मौसम में कवक के शरीर के सफेद धागे पत्ती के आवरणों की सतह पर देखे जा सकते हैं। 

File Courtesy: 
DRR ट्रेनिंग मैनुअल
Image Courtesy: 
CRRI
6
Sep

शीथ ब्लाइट का सामान्य रोगाणु

• शीथ ब्लाइट रोग थानेटोफोरस कुकुमेरिस एनामॉर्फ [Thanetophorus cucumeris anamorph (Rhizoctonia solani)] कवक द्वारा उत्पन्न होता है।

File Courtesy: 
DRR ट्रेनिंग मैनुअल
6
Sep

शीथ ब्लाइट के लक्षण

 शीथ ब्लाइट रोग के लक्षण

1. शीथ ब्लाइट रोग प्रायः पौधे के बाद वाले वृद्धि चरणों में दिखाई पड़ते हैं। 

2. आरंभिक लक्षण प्रायः जल स्तर के पास की निचली पत्ती के आवरण पर जख्म के रूप में उत्पन्न होते हैं, या ये आरंभिक अंतरसंधि दीर्घीकरण अवस्था (जल जमाव के लगभग 10 से 15 दिनों के बाद) में भी उत्पन्न होते हैं। 

File Courtesy: 
एपिडेमियोलॉजी ऑफ राइस डिजीजेस (डॉ. कृष्णवेणी)
Image Courtesy: 
एपिडेमियोलॉजी ऑफ राइस डिजीजेस (डॉ. कृष्णवेणी)
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