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Diseases

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7
Sep

शीथ रॉट का आर्थिक महत्व

 1. शीथ रॉट का आर्थिक महत्व निम्नलिखित हैं  :  

2. शीथ रॉट चावल की फ़सल की वृद्धि अवधि के दौरान देर से उत्पन्न होता है। 

3. ताइवान में इससे 20% से 85% क्षति होती है तथा वियतनाम, फिलिपींस तथा भारत में 30% से 80% तक नुकसान होता है। 

4. जापान में इस रोग से 51,000 से 122,000 हेक्टेयर्स भूमिक्षेत्र प्रभावित हुआ जिसमें वार्षिक रूप से 16,000-35,000 टन अनाज की क्षति हुई। 

 

File Courtesy: 
http://www.knowledgebank.irri.org/ricedoctor/I ndex.php?option=com_content &view=article& id=566&Itemid=2771
Image Courtesy: 
DRR
7
Sep

शीथ रॉट का वितरण तथा मौजूदगी

• शीथ रॉट का वितरण तथा मौजूदगी 

Sarocladium oryzae द्वारा उत्पन्न शीथ रॉट निम्नलिखित राज्यों में व्यापक रूप से देखा जाता है: 

आंध्र प्रदेश  

केरल, उड़ीसा

तमिलनाडु 

बिहार 

पश्चिम बंगाल तथा 

 

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चावल रोग के समेकित प्रबंधन में प्रगतियां (डॉ. कृष्णवेणी)
7
Sep

शीथ रॉट का इतिहास

1. चावल का शीथ रॉट रोग सबसे पहले  भारत में (अग्निहोथ्रुडू, 1973) में देखा गया था।   

2. Sarocylindrium oryzae नाम के रोगाणु को बाद में Sarocladium oryzae ( हॉक्सवर्थ, 1975) का नाम दिया गया। 

3. 1978 से 79 के बीच पंजाब में इस रोग से चावल की उपज में भारी क्षति हुई थी। 

4. नेलोर (1976). बीज आंतरिक तथा बाह्य रूप से तैयार किया गया (शाहजहां, तथा अन्य 1977)

 

 

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चावल रोग के समेकित प्रबंधन में प्रगतियां (डॉ. कृष्णवेणी)
7
Sep

शीथ रॉट (Sarocladium oryzae)

यह रोग परिपक्वता काल में उत्पन्न होता है।  

1. रोगाणु सामान्यतः नव-पुष्पगुच्छ को आवृत करने वाले सबसे ऊपर के पत्र आवरण पर हमले करता है। 

2. चॉकलेट भूरे रंग के आयताकार या अनियमित आकार के धब्बे बूट पत्रावरण पर विकसित होते हैं। चावल का शीथ रॉट रोग  Sarocladium oryzae द्वारा उत्पन्न होता है।  

3. यह सबसे ऊपर के फ्लैग पत्र आवरण को क्षतिग्रस्त करता है, जहां यह बूटिंग अवस्था में नव पुष्प-गुच्छों को ढंकने वाले आवरण को संक्रमित करता है।  

7
Sep

स्टेम रॉट के रासायनिक नियंत्रण

 स्टेम रॉट के रासायनिक नियंत्रण में निम्नलिखित रसायन उपयोग किए जाते हैं:

1. मध्य जुताई वाली अवस्था में फेंटिन हाइड्रॉक्साइड का छिड़काव किया जाता है, टायोफेनैट-मिथाइल रोग के फैलने के समय छिड़का जाता है, जिससे स्टेम रॉट का प्रभाव कम पड़ता है।  

2. अन्य कवकनाशी जैसे फेरीमजोन तथा वैलीडामाइसिन ए भी इस कवक के ख़िलाफ कारगर पाया गया है। 

 

7
Sep

स्टेम रॉट का पारंपरिक नियंत्रण

 स्टेम रॉट रोग के नियंत्रण की पारंपरिक विधियों में निम्नलिखित शामिल हैं।  

1. पुआल तथा ठूंठ या कटाई के बाद फ़सल के कचरे को जलाना या पुआल को सड़ने को छोड़ देना तथा खेत से पानी का निकास करने से स्क्लेरोटिया पर नियंत्रण पाया जा सकता है। 

2. उर्वरक के संतुलित उपयोग से तथा पोटाश तथा चूने की अधिक मात्रा के साथ स्प्लिट अनुप्रयोग से मिट्टी pH मान बढ़ता है, जिससे स्टेम रॉट संक्रमण घटता है और उपज में वृद्धि होती है।  

 

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http://www.knowledgebank.irri.org/ricedoctor/ index.php?option=com_content &view=article &id=567&Itemid=2772
7
Sep

स्टेम रॉट का प्रतिरोधी पोषक पौधा

 स्टेम रॉट रोग के लिए पोषक पौधे की क्रियाविधि 

1. स्टेन रॉट कवक पौधे को सीधा भेदते हैं अथवा वे घाव पर हमला करते हैं। 

2. यह ध्यान रखें कि चोटिल या दबाव वाले चावल के पौधों (अर्थात, फेनॉक्सी हर्बीसाइड्स) में संक्रमण के बढ़ने और रोग के अधिक विकास की प्रवृत्ति देखी गई है।  

3. प्रतिरोधी किस्मों का इस्तेमाल करें।  

 

 

File Courtesy: 
http://www.ipm.ucdavis.edu/PMG/r682100211.html
7
Sep

स्टेम रॉट के प्रबंधन के विकल्प

• स्टेम रॉट प्रबंधन के विकल्पों में पारंपरिक नियंत्रण, रासायनिक नियंत्रण तथा प्रतिरोधी किस्मों की खेती शामिल हैं।

7
Sep

स्टेम रॉट के पूर्व प्रवृत्त कारक

 स्टेम रॉट के पूर्व प्रवृत्त कारक  हैं: 

1. ऊपरी मृदा स्तर या सींचाई वाले जल में संक्रमण पिंड या स्क्लेरोटिया की उपस्थिति 

2. कवक के प्रवेश के लिए पौधे पर घाव का होना। 

3. पुष्पगुच्छ में मौजूद नमी की मात्रा 

4. नाइट्रोजन उर्वरक का अनुप्रयोग। 

5. सफेद टिप वाले नेमाटोड की उपस्थिति, जो स्टेम रॉट रोग के साथ सहयोगी प्रभाव डालता है। 

 

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DRR ट्रेनिंग मैनुअल
7
Sep

स्टेम रॉट के रोगाणु का नाम

• स्टेम रॉट रोग उत्पन्न वाला आम जीव Sclerotium oryzae Cattaneo है।

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DRR ट्रेनिंग मैनुअल
7
Sep

स्टेम रॉट के लक्षण

 स्टेम रॉट के लक्षण 

1. पहला लक्षण छोटे, काली अनियमित आकार वाले जख्म के रूप में दिखाई पड़ता है, जो जल स्तर के पास वाले बाहरी पत्र आवरण पर उभरता है।  

2. कवक आंतरिक पत्र आवरण को भेदता है, जिससे तने के आधारी भाग में सड़न पैदा होती है।  

3. प्रभावित तने के आवरण पर कई सारे काले, गोल चमकते हुए पिंड निर्मित होते हैं, तथा वे परिपक्वता पर खोखले अंतरसंधियों पर भी दिखाई पड़ते हैं।   

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DRR ट्रेनिंग मैनुअल
7
Sep

स्टेम रॉट का आर्थिक महत्व

स्टेम रॉट का आर्थिक महत्व निम्नलिखित हैं: 

1. कई देशों में भारी नुकसान उत्पन्न करता है। उदाहरण के लिए जापान में 51,000 से 122,000 हेक्टेयर्स संक्रमित पाया गया। एक आकलन के मुताबिक इस रोग से होने वाला वार्षिक नुकसान 16,000 से 35,000 रहा।   

2. भारत में इस रोग से होने वाला नुकसान 30% से 80% तक देखा गया।

 

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http://www.knowledgebank.irri.org/ric edoctor/index.php?option=com_conte nt&view=article&id=567&Itemid=2772
7
Sep

स्टेम रॉट का वितरण तथा मौजूदगी

स्टेम रॉट का वितरण तथा मौजूदगी निम्नलिखित प्रकार से है: 

1. संक्रमित पिंड या स्क्लेरोटिया मिट्टी की ऊपरी परत पर पाए जाते हैं। वे हवा से सूखी मिट्टी में, चावल की गीली मिट्टी के अंदर तथा नल के पानी में पाये जाते हैं।  

2. ये पुआल पर भी उगते हैं, जो मिट्टी में दब जाते हैं।  स्क्लेरोटिया सींचाई वाले पानी पर तैरते रहते हैं तथा जमीन की तैयारी के समय       

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7
Sep

स्टेम रॉट (sclerotium oryzae)

1. स्टेम रॉट sclerotium oryzae द्वारा उत्पन्न होता है, जो धान की पुआल तथा मिट्टी में पिन हेड आकार के स्क्लेरोटिया के जरिए जीवित रहता है। 

2. जल-जमाव वाले क्षेत्र के लिए यह एक महत्वपूर्ण रोग होता है। 

3. कवक द्वारा उत्पन्न स्क्लेरोटिया प्राथमिक इनोकुलम स्रोर के रूप में कार्य करता है, जो जल पर तैरता रहता है और जलसतह पर स्वस्थ पौधे के तने को संक्रमित करता है। 

4. चावल के पौधे के परिपक्वता पर पहुंचने के कारण तथा फसल के कचरे के विकसित होने पर स्क्लेरोटिया प्रचुर मात्रा में संक्रमित उत्तक का निर्माण करता है।

 

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DRR ट्रेनिंग मैनुअल
7
Sep

नैरो ब्राउन स्पॉट के प्रबंधन विकल्प

नैरो ब्राउन स्पॉट रोग के प्रबंधन विकल्प  

1. पारंपरिक पद्धतियां, जैसे पोटाशियम तथा फॉस्फोरस उर्वरकों का उपयोग तथा जल्द परिपक्व होने वाली किस्मों की खेती करने से इस रोग पर प्रभावी तरीके से नियंत्रण पाया जा सकता है।  

2. इस रोग के नियंत्रण में प्रतिरोधी किस्मों की खेती से काफी लाभ मिलता है। 

3. प्रतिरोधी किस्मों तथा प्रजातियों की खेती केवल अमेरिका तथा भारत में की जाती है। 

4. रोग के दिखाई देने पर बेनोमाइल, प्रॉपिकैनाजोल, कार्बेंडाजिम, प्रोपिकोनाजोल तथा आइप्रोडायोन जैसे कवकनाशी के छिड़काव प्रभावी माना जाता है। 

 

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http://www.knowledgebank.irri.org/rice doctor/index.php?option=com_सामग्री &view=a rticle&id=560&Itemid=2765
7
Sep

नैरो ब्राउन स्पॉट के पूर्व प्रवृत्त कारक

नैरो ब्राउन स्पॉट के पूर्व प्रवृत्त कारक हैं: 

1. पोटैशियम की कमी वाली मिट्टी में धान की फ़सल उगाया जाना। 

2. तापमान 25 से 28 डिग्री से.

3. संवेदनशील किस्मों को उगाना 

4. रोग की घटना वृद्धि अवस्था में होता है। 

 

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7
Sep

नैरो ब्राउन स्पॉट का सामान्य रोगाणु

• नैरो ब्राउन स्पॉट का सामान्य रोगाणु Cercospora janseana (Cercospora oryzae) होता है।

7
Sep

नैरो ब्राउन स्पॉट के लक्षण

 नैरो ब्राउन स्पॉट रोग द्वारा विकसित लक्षण            

1. पत्र फलक पर छोटा-संकरा, दीर्घवृत्ताकार से लेकर रैखिक भूरा जख्म उभरते हैं। कभी-कभी ये पत्र आवरण, पुष्पवृंत तथा ग्लूम और छिलके पर भी उत्पन्न होते हैं।   

2. जख्म लगभग 2-10 मिमी तथा 1 मिमी चौड़े होते हैं। 

3. प्रतिरोधी किस्मों में ये जख्म संकरे, छोटे तथा गहरे भूरे होते हैं।

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http://www.knowledgebank.irri.org/ricedoctor/inde x.php?option=com_सामग्री &view=article&id=560 &Itemid=2765
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DRR ट्रेनिंग मैनुअल
7
Sep

नैरो ब्राउन स्पॉट के लक्षण

 नैरो ब्राउन स्पॉट रोग द्वारा विकसित लक्षण

1. पत्र फलक पर छोटा-संकरा, दीर्घवृत्ताकार से लेकर रैखिक भूरा जख्म उभरते हैं। कभी-कभी ये पत्र आवरण, पुष्पवृंत तथा ग्लूम और छिलके पर भी उत्पन्न होते हैं।   

2. जख्म लगभग 2-10 मिमी तथा 1 मिमी चौड़े होते हैं। 

3. प्रतिरोधी किस्मों में ये जख्म संकरे, छोटे तथा गहरे भूरे होते हैं।

4. संवेदनशील किस्मों में जख्म चौड़े तथा हल्के भूरे होते हैं, जो धूरस उत्तक क्षय के केंद्र पर दिखाई पड़ते हैं। 

5. संवेदनशील किस्मों पर पत्ती का उत्तक क्षय भी दिखाई पड़ता है। 

7
Sep

नैरो ब्राउन स्पॉट के लक्षण

नैरो ब्राउन स्पॉट रोग द्वारा विकसित लक्षण                     

1. पत्र फलक पर छोटा-संकरा, दीर्घवृत्ताकार से लेकर रैखिक भूरा जख्म उभरते हैं। कभी-कभी ये पत्र आवरण, पुष्पवृंत तथा ग्लूम और छिलके पर भी उत्पन्न होते हैं।   

2. जख्म लगभग 2-10 मिमी तथा 1 मिमी चौड़े होते हैं। 

3. प्रतिरोधी किस्मों में ये जख्म संकरे, छोटे तथा गहरे भूरे होते हैं।

4. संवेदनशील किस्मों में जख्म चौड़े तथा हल्के भूरे होते हैं, जो धूरस उत्तक क्षय के केंद्र पर दिखाई पड़ते हैं। 

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