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Diseases

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7
Sep

फॉल्स स्मट का आर्थिक महत्व

1. केवल स्मटयुक्त बॉल की वजह से उपज की हानि नहीं होती,

बल्कि स्मट बॉट को शरण देने वाले कर्नेल्स की बढ़ी हुई अनुर्वरता की वजह से भी ऐसा होता है।.

2. चावल की विभिन्न किस्मों में उपज की हानि 0.2-49% तक देखी गई है।.

3. अधिकतर स्मट्युक्त बॉल मध्य भाग में देखा जाता है तथा रोगयुक्त पुष्प-गुच्छ का वजन उल्लेखनीय रूप से घटता है।

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7
Sep

फॉल्स स्मट का वितरण तथा मौजूदगी

• यह रोग पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पश्चिम बंगाल और

बिहार में गंभीर और विनाशकारी रूप में पाया जाता है।

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7
Sep

फॉल्स स्मट का इतिहास

1. फॉल्स स्मट रोग को कूक ने 1878 में तमिलनाडु के तिरुवेलुली में पहचाना था।.

2. तब से यह जापान, अमेरिका, फिलीपिंस और अन्य देशों में भी देखा गया।

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7
Sep

फॉल्स स्मट

1. किसानों के बीच एक व्यापक धारणा यह है कि

फाल्स स्मट की मौजूदगी बम्पर उपज का एक संकेत है। 

2. फॉल्स स्मट को चावल की एक गंभीर रोग समस्या के रूप में पहचाना गया है। अधिकतर तैयार हाइब्रिड खेतों की परिस्थितियों में इसके प्रति संवेदनशील देखे गए हैं। 

3. यह रोग ठंडे चावल उत्पादन क्षेत्रों में उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की तुलना में अधिक गंभीर पाया गया है।  

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7
Sep

बैकेनी का रासायनिक नियंत्रण

फुट रॉट बैकेनी रोग के नियंत्रण के लिए प्रयुक्त रसायन हैं: 

1. बेंजिमिडाजोल्स का पत्र पर छिड़काव। 

2. बीज जनित संक्रमण को रोकने के लिए बीजों का ट्रिफोरिन तथा ट्रिफ्लूमिजोल के साथ उपचार। 

3. ट्रिफ्लुमिजोल, प्रोपिकोनाजोल तथा प्रोक्लोराज उन किस्मों के लिए प्रभावी पाए गए जो बेनोमाइल तथा थिरैम और बेनोमाइल के संयोजन के लिए प्रतिरोधी होते हैं। 

 

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7
Sep

बैकेनी के नियंत्रण के लिए पारंपरिक विधियां

फुट रॉट बैकेनी रोग के नियंत्रण के लिए पारंपरिक विधियां निम्नलिखित हैं: 

1. स्वस्थ बीज का चयन 

2. जल्द पकने वाले वाली किस्मों को देर से बोना। 

 

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7
Sep

बैकेनी के प्रति प्रतिरोधी किस्म

·        ADT 8,
·        अग्नी मोटाकैब,
·        आर्यन,
·       
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7
Sep

बैकेनी का प्रबंधन विकल्प

• चावल के बैकेनी रोग के प्रबंधन विकल्पों में प्रतिरोधी किस्म,

पारंपरिक विधि, जैविक तथा रासायनिक नियंत्रण शामिल हैं।

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7
Sep

बैकेनी का रोग चक्र

1. यह रोग बीज तथा मिट्टी जनित होता है।  रोगग्रस्त पौधे से पुष्प-गुच्छ का संक्रमण हेडिंग से लेकर कटाई के चरण में द्वितीयक वायु-जनित कोनिडिया तथा ऐस्कोस्पोर्स विमोचन द्वारा उत्पन्न होता है।  

2. कवक आखिरकार वर्तिकाग्र में अंतरकोशिकीय तथा परागकोष में पहुंचता है तथा अंडाशय को ढंकता है।  

 

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7
Sep

बैकेनी के पूर्व प्रवृत्त कारक

फुट रॉट बैकेन रोग को बढ़ावा देने वाले कारक:         

1. संक्रमित बीज 

2. मिट्टीजनित रोगाणु 

3. उच्च नाइट्रोजन अनुप्रयोग 

4. 30 से 35° C का तापमान 

5. हवा तथा जल के जरिए स्पोर का एक पौधे से दूसरे का परिवहन।

6. चावल की फ़सल के बिचड़े तथा टिलरिंग की अवस्था।  

 

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7
Sep

बैकेनी के लक्षण

 बैकेनी रोग के लक्षण:                                                   

1. यह रोग बीज की क्यारी में तथा मुख्य खेत में भी पैदा होता है। रोगग्रस्त बिचड़े लंबे और हल्के पीले रग के हो जाते हैं। ऐसे बिचड़े प्रतिरोपण के पहले या उसके बाद में मृत हो जाते हैं।  

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7
Sep

बैकेनी का आर्थिक महत्व

 फुट रॉट बैकेनी रोग का आर्थिक महत्व: 

1. हरियाणा तथा पश्चिम बंगाल में इस रोग से होने वाला नुकसान 3.0 से 95.3% तक देखा गया है।  

 

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7
Sep

बैकेनी का वितरण तथा मौजूदगी

भारत में यह निम्नलिखित राज्यों में पाया जाता है: 

• आंध्र प्रदेश 

• असाम 

• हरियाणा 

• मणिपुर 

• तमिलनाडु 

• उत्तर प्रदेश 

• पश्चिम बंगाल 

 

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7
Sep

बैकेनी का इतिहास

1. फुट रॉट बैकेनी रोग का पता 1828 में जापान में लगा।  

2. वर्ष 1931 में भारत में फुट रॉट बैकेनी को फुट रॉट के एजेंट के रूप में वर्णित  किया गया। 

3. भारत में इसे थॉमस (1931) ने फुट रॉट रोग के रूप में वर्णित किया। 

 

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7
Sep

बैकेनी ( Fusarium moniliforme) का परिचय

1. चावल का फुट रॉट तथा बैकेनी  Fusarium moniliforme शेल्ड द्वारा उत्पन्न होता है। 

2.Gibberlla fujikuroi लगभग सभी चावल उत्पादक क्षेत्र में पाया जाता है है और फ़सल को काफी नुकसान पहुंचाता है। 

3. भारत में यह आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, मणिपुर, पश्चिम बंगाल, असम तथा हरियाणा में पाया जाता है।  

4. हरियाणा तथा पश्चिम बंगाल में इस रोग से फ़सल को होने वाली हानि 3.0 से 95.3% तक देखी गई।  

 

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7
Sep

शीथ रॉट का रासायनिक उपचार

1. बूटिंग पत्र अवस्था से आरंभ कर महीने में दो बार कार्बेंडाजिम का अनुप्रयोग प्रभावी माना जाता है। 

2. अन्य उत्पाद जैसे थायोफैनेट-मिथाइल, एडिफेंफॉस, हेक्साकॉनाजोल, प्रोपिकोनाजोल तथा मैंकोजेब भी इस रोग के नियंत्रण में प्रभावी माने जाते हैं।  

3. हाइब्रिड के लिए, KRH 2, NSD 2, PA 6444 तथा इंडैम 100-003 इस रोग के खिलाफ मध्यम रूप से प्रभावी पाए गए है। 

 

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7
Sep

शीथ रॉट के प्रबंधन के विकल्प

शीथ रॉट के नियंत्रण के उपाय:

1. फ़सल कटाई के बाद संक्रमित ठूंठ हटाकर तथा पौधों के बीच अधिकतम स्थान रखकर इस रोग को कम किया जा सकता है।  

2. जुताई की अवस्था में पोटाश का इस्तेमाल रोग के नियंत्रण में सहायक होता है। 

3. कैशियम सल्फेट तथा जिंक सल्फेट का पत्तियों पर छिड़काव से शीथ रॉट के रोग पर नियंत्रण होता है। 

4. बूटिंग अवस्था में बीज उपचार तथा पत्तियों पर कार्बेंडाजिम, एडिफेंफॉस या मैंकोजेब के छिड़काव से शीथ रॉट में कमी आती है। 

5. बेनोमाइल तथा कॉपर ऑक्सीक्लोराइड के छिड़काव को भी प्रभावी पाया गया है। 

 

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http://www.knowledgebank.irri.org/ricedoctor/in dex.php?option=com_content &view=article &id=566&Itemid=2771
7
Sep

शीथ रॉट के पूर्वप्रवृत्त कारक

 1. इस रोग का विकास तथा इसकी तीव्रता पोषक पौधे की आयु बढ़ने के साथ बढ़ती है। 

2. रोग का ऊर्ध्वाधर तथा क्षैतिज विकास चावल की किस्मों में अधिकतर पुष्पण की अवस्था में होता है।   

3. 24.4-32.00C के न्यूनतम माध्य तथा अधिकतम माध्य तापमान रेंज की स्थिति में उच्च आपेक्षिक आर्द्रता तथा रुक-रुक कर होने वाली बारिश से इस रोग के गंभीर लक्षण पैदा होते हैं। 

4. निम्न (130C) तथा उच्च (340C) तापमान तथा कई दिनों की निरंतर बारिश से इस रोग के विकास पर प्रतिकूल असर पड़ता है। 

 

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DRR ट्रेनिंग मैनुअल ( एपिडेमोलॉजी)
7
Sep

शीथ रॉट का सामान्य रोगाणु

शीथ रॉट का सामान्य रोगाणु Sarocladium oryzae है।

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7
Sep

शीथ रॉट के लक्षण

शीथ रॉट के लक्षण                                                                     

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DRR ट्रेनिंग मैनुअल ( एपिडोमॉलोजी)
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DRR ट्रेनिंग मैनुअल (एपिडोमॉलोजी)
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