Best Viewed in Mozilla Firefox, Google Chrome

Diseases

Diseases
12
Sep

राइस बंची स्टंट वायरस का पारंपरिक विधि द्वारा नियंत्रण

• इस रोग के नियंत्रण में केवल प्रतिरोधी प्रजातियों की खेती ही कारगर सिद्ध होती है।

12
Sep

राइस बंची स्टंट वायरस के नियंत्रण के उपाय

राइस बंची स्टंट वायरस का नियंत्रण प्रतिरोधी किस्मों को उपजाकर किया जा सकता है।

12
Sep

राइस बंची स्टंट वायरस

1. राइस बंची स्टंट वायरस का एकमात्र ज्ञात पोषक पौधा चावल है। राइस बंची स्टंट वायरस में ds-DNA के 12 खंड होते हैं।

2. इन खंडों के आण्विक द्रव्यमान हैं 2.70, 2.30, 1.90, 1.70, 1.68, 1.50, 1.38, 1.20, 1.10 , 0.60 ,0.35 तथा 0.25X106 डाल्टन्स

3. कणों में RNA सामग्री 17.5% होती है।

File Courtesy: 
google book
12
Sep

राइस बंची स्टंट रोग के पूर्व प्रवृत्त कारक

राइस बंची स्टंट वायरस रोग को बढ़ावा देने वाले कारक निम्न हैं:

1. अधिक घास-पात वाले पौधों के साथ देर से रोपा गया पौधा।

2. जड़ों वाली चावल की फ़सल की उपस्थिति 3. वाहक की उपस्थिति

File Courtesy: 
google book
12
Sep

राइस बंची स्टंट रोग के लक्षण

1. राइस बंची स्टंट वायरस (RBSV) से टिलरिंग में वृद्धि होती है, तथा अत्यधिक शाखन होता है। इसमें पत्तियां संकरी हो जाती हैं।

2. गंभीर संक्रमण की स्थिति में शाखाएं ऊपरी गांठ से बनती हैं तथा पत्तियां शाखाओं में बंट जाती हैं।

File Courtesy: 
google book
12
Sep

राइस बंची स्टंट

1. राइस बंची स्टंट रोग का पहली बार पहचान चीन के फुजियान में 1978 में की गई थी। यह फुजियान, गुन्डॉग, गुऐंक्सी, हुबी, हुमान जैंग्क्सी तथा चीन में पाया जाता है।

2. राइस बंची स्टंट वायरस के कण पॉलीहाइड्रल होते हैं, जो 60.3nm व्यास वाले होते हैं।

3. राइस बंच स्टंट वायरस को संक्रमित चावल की पत्तियों से फॉस्फेट बफर में मैकेरेशन द्वारा अलग किया जाता है।

4. शुद्ध वायरस का घोल 260nm पर अधिकतम तथा 240nm पर न्यूनतम अवशोषण प्रदर्शित करता है।

File Courtesy: 
google book
12
Sep

राइस ग्रासी स्टंट रोग के नियंत्रण की पारंपरिक विधियां

राइस ग्रासी स्टंट रोग के नियंत्रण की विधियां:

1. एक सिंगल प्रभावी जीन प्रतिरोध का निर्धारण करता है।

2. जंगली चावल की एक किस्म Oryza nivara Sharma तथा Shastry, को इस रोगाणु के खिलाफ प्रतिरोधी पाया गया है।

3. भूरे टिड्डे के नियंत्रण के लिए रासायनिक अथवा प्रतिरोधी किस्मों का इस्तेमाल या अन्य नियंत्रण विधियों का प्रयोग किया जाता है।

File Courtesy: 
http://www.knowledgebank.irri.org/ricedoctor /index.php?option=com_content &view=artic le&id=563&Itemid=2768
12
Sep

प्रतिरोधक पोषक पौधों द्वारा राइस ग्रासी स्टंट का नियंत्रण

1. ग्रासी स्टंट वायरस का संचरण भूरे टिड्डे Nilaparvata lugens Stal द्वारा होता है। 

2. रोग का प्रसार  Nilaparvata bakeri Muir तथा N. muiri China द्वारा भी होता है। 

3. वायरस तथा उसके वाहक के बीच अंतःक्रिया बिना ट्रांसोवायरल मार्ग से होता है। 

4. कीट इस वायरस को 30 मिनट में प्राप्त कर लेता है, जो उसके आहार अवधि के दौरान होता है। 

5. पौधे 9 मिनट की आहार अवधि में भी संक्रमित हो सकते हैं। कीटों में इंक्युबेशन में 5-28 दिन लग सकते हैं, जो औसतल 11 दिनों का होता है।  

File Courtesy: 
http://www.knowledgebank.irri.org/ricedoctor/I ndex.php?option=com_content &view=article& id=563&Itemid=2768
12
Sep

राइस ग्रासी स्टंट के नियंत्रण

राइस ग्रासी स्टंट वायरस रोग के नियंत्रण के उपायों में प्रतिरोधी किस्मों की बुआई शामिल है।

File Courtesy: 
http://www.knowledgebank.irri.org/ricedoc tor/index.php?option=com_content &view =article&id=563&Itemid=276
12
Sep

राइस ग्रासी स्टंट वायरस (RGSV)

1. राइस ग्रासी स्टंट वायरस (RGSV) टेनिवायर्स का एक सदस्य होता है।

2. इसमें महीन फिलामेंट वाले कण होते हैं, जो 6-8 nm व्यास वाले होते हैं।

3. इसके नोडल कंटूर की लंबाई 950-1,350 nm होती है।

4. इस कण में एक कैप्सिड प्रोटीन होता है तथा जीनोम चार सिंगल स्ट्रेंडेड आरएनए से बना होता है।

File Courtesy: 
http://www.knowledgebank.irri.org/ricedoc tor/index.php?option=com_cintenet &view =article&id=563&Itemid=2768
12
Sep

राइस ग्रासी स्टंट रोग के पूर्व प्रवृत्त कारक

राइस ग्रासी स्टंट रोग के विकास को बढ़ावा देने वाले कारक निम्न हैं:

1. वाहक की उपलब्धता.

2. सभी विकास अवस्थाएं, खासकर चावल फ़सल की टिलरिंग अवस्था।

File Courtesy: 
http://www.knowledgebank.irri.org/ricedo ctor/index.php?option=com_content &vie w=article&id=563&Itemid=2768
12
Sep

राइस ग्रासी स्टंट रोग के लक्षण

राइस ग्रासी स्टंट रोग के लक्षण हैं:

1. इसके लक्षणों में शामिल हैं वृद्धि का अवरुद्ध होना, प्रचुर टिलरिंग तथा पीले या हरे रंग की पत्तियां जिनपर धूल वाले भूरे धब्बे उभर आते हैं, जो फैलकर पौधों को पीतल का रंग देते हैं।

2. पुष्पण नहीं होता है तथा पौधे झाड़ीदार दिखाई पड़ते हैं। पत्तियां कड़ी तथा सीधी दिखाई पड़ती हैं।

File Courtesy: 
DRR ट्रेनिंग मैनुअल
12
Sep

राइस ग्रासी स्टंट

1. राइस ग्रासी स्टंट रोग का वर्णन रिवेरा तथा अन्य (1966) तथा बर्गोनिया तथा अन्य (1966) द्वारा किया गया था। इसके वायरस का पता 1985 में हिबिनो तथा अन्य ने लगाया था। 

2. इस वायरस के लिए पर्याय है “राइस रिसेट वायरस” (बर्गोनिया तथा अन्य, 1966)

3. यह फिलामेंट कणों वाला एक वायरस है, जिनमें कई वृत्ताकार होते हैं, और आदर्श लंबाई 950-1350 x 6-8 nm की होती है।  

4. यह हरे टिड्डों द्वारा खासकर  Nilaparvata lugens द्वारा संचरित होता है। 

5. इसकी पोषक किस्में हैं Oryza spp. अत्था Nilaparvata spp. 

File Courtesy: 
http://www.dpvweb.net/dpv/showdpv.php?dpvno=320
12
Sep

राइस टंग्रो डिज़ीज़ का रासायनिक नियंत्रण

1. अंकुरित बीजों को बोने से पहले नर्सरी की 2-5 सेमी. के ऊपरी स्तर में कार्बोफ्युरॉन 3 G @ 30 से लेकर 35 kg/ ha या फॉरेट 10 G @12 से 15 kg / ha इस्तेमाल करना चाहिए। यदि यह संभव न हो तो अनुशंसित कीटनाशी को बुआई के 4-5 दिनों के बाद पानी के पतली परत में डालना चाहिए, जिसे पूरी तरह से जमीन में रिसने छोड़ देना चाहिए। 

2. प्रतोरोपित पौधे की सुरक्षा के लिए  मोनोक्रोटोफोस 36 EC @ 1.0 L/ ha या कार्बेरिल 50 WP @ 2.0 kg/ha या फॉस्फैमिडोन 85 WSC @ 0.65 L/ha का फोलियर स्प्रे बुआई के 15वें तथा 25वें दिन पर करना चाहिए, जो हरे टिड्डे की संख्या पर निर्भर करेगा।  

File Courtesy: 
DRR मैनुअल
12
Sep

राइस टंग्रो डिज़ीज़ के नियंत्रण की पारंपरिक विधि

1. कृषि-विज्ञान पद्धतियों के साथ समायोजन के साथ फ़सल की आयु बढ़ने से चावल की फ़सल रोग के प्रति प्रतिरोधी बन जाती है।   

2. आम तौर पर संवेदनशील किस्म भी 75 दिनों के बाद इस रोग से प्रभावित नहीं होता। 

3. नर्सरी में नये पौध इस रोग के वाहक तथा वायरस से संक्रमित होने के लिए काफी संवेदनशील होते हैं।  

4. बुआई का समय इस तरह से समायोजित करना चाहिए कि वाहकों की अधिकतम संख्या से बचा जा सके। 

File Courtesy: 
DRR ट्रेनिंग मैनुअल ( डॉ. कृष्णवेणी)
12
Sep

प्रतिरोधी पोषक पौधों के द्वारा राइस टंग्रो डिज़ीज़ का नियंत्रण

1. टंग्रो वायरस के नियंत्रण की आदर्श विधि है प्रतिरोधी किस्मों को उगाना, खासकर स्थान विशेष में प्राथमिक संक्रमण से बचने के लिए; ताकि मध्यम रूप से प्रतिरोधी किस्मों की कटाई कम से कम नुकसान के साथ की जा सके।.

2. राइस टंग्रो डिज़ीज़ के लिए महत्वपूर्ण प्रतिरोधी किस्म विक्रमार्य तथा निधि हैं।

File Courtesy: 
DRR मैनुअल
12
Sep

राइस टंग्रो डिज़ीज़ के नियंत्रण के उपाय

• राइस टंग्रो डिज़ीज़ के नियंत्रण के उपायों में पारंपरिक नियंत्रण, रासायनिक नियंत्रण तथा प्रतिरोधी किस्मों का इस्तेमाल शामिल हैं।

File Courtesy: 
DRR ट्रेनिंग मैनुअल
Image Courtesy: 
CRRI
12
Sep

राइस टंग्रो रोग के वायरस

1. राइस टंग्रो बेसिलिफॉर्म वायरस (RTBV) एक रिवर्स- ट्रांस्क्राइबिंग डीएनए वायरस है जो RNA वायरस, राइस टंग्रो स्फेरिकल वायरस (RTSV) के साथ मिलकर राइस टंग्रो डिज़ीज़ी उत्पन्न करता है।

File Courtesy: 
http://jvi.asm.org/cgi/content /full/74/5/2073
Image Courtesy: 
CRRI
12
Sep

राइस टंग्रो डिज़ीज़ी के पूर्व प्रवृत्त कारक

राइस टंग्रो डिज़ीज़ी के विकास को बढ़ावा देने वाले कारक: 

1. यह रोग कई कारकों की वजह से उत्पन्न होता है, जैसे वायरस के स्रोतों की उपलब्धता (प्राथमिक इनोकुलम), पोषक पौधे की उपस्थिति जो वायरस तथा वाहको दोनों के प्रति संवेदनशील हों, पोषक पौधे की सही विकास अवस्था, वाहकों की उपलब्धता तथा अनुकूल जलवायविक दशाएं। 

2. सींचाई वाले जल की कमी से भी टंग्रो रोग को बढ़ावा मिलता है, क्योंकि किसान पौधों को एक कतार से लगाने के लिए मजबूर होते हैं। 

 

File Courtesy: 
DRR ट्रेनिंग मैनुअल ( डॉ. कृष्णवेणी)
12
Sep

राइस टंग्रो डिज़ीज़ के लक्षण

राइस टंग्रो डिज़ीज़ के लक्षण: 

1. आरंभिक अवस्था में उत्पन्न संक्रमण से पौधे की वृद्धि अधिक रुकती है। राइस टंग्रो डिज़ीज़ के आरंभिक लक्षण हैं अंतरशिरीय क्लोरोसिस तथा संक्रमित पत्तियों में ऐंठन उत्पन्न होना। 

2. पत्ती का रंग हरे-पीले से लेकर लाल भूरे या पीले-भूरे रंग का हो जाता है।  

File Courtesy: 
DRR ट्रेनिंग मैनुअल (डॉ कृष्णवेणी)
Image Courtesy: 
DRR ट्रेनिंग मैनुअल ( डॉ कृष्णवेणी)
Syndicate content
Copy rights | Disclaimer | RKMP Policies