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National

27
Oct

Producing the seeds of KRH-2 in the farmer's (Mr.Manjunath)field

Producing the seeds of KRH-2 in the farmer's (Mr.Manjunath) field

ಶ್ರೀ. ಮಂಜುನಾಥ: ಮಿಶ್ರ ತಳಿ ಭತ್ತ- ಯಶಸ್ಸಿನ ಹಾದಿ

File Courtesy: 
ZARS, Mandya
Related Terms: Farmers InnovationFIS
27
Oct

KRH-2 ಹೈಬ್ರಿಡ್ ಫ್ರಂಟ್ಲೈನ್ ಪ್ರದರ್ಶನಗಳು

KRH-2 ಹೈಬ್ರಿಡ್ ಫ್ರಂಟ್ಲೈನ್ ಪ್ರದರ್ಶನಗಳು

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ZARS, Mandya
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27
Oct

KRH-2 Hybrid Rice Cultivation - A farmer's experience in Karnataka

ಗೋವಿಂದಪ್ಪ- ಕೆ ಆರ್ ಹೆಚ್- 2 ಮಿಶ್ರ ತಳಿ ಭತ್ತದ ಬೆಳೆಯಲ್ಲಿ ಎತ್ತಿದ ಕೈ

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ZARS, Mandya
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27
Oct

శ్రీ పద్ధతిలో చెరకు సాగు

శ్రీ పద్ధతిలో చెరకు సాగు

రైతు గురించి:

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27
Oct

ఆర్.జి.ఎల్. - 2537 రకం వరిని సాగుచేయడం ద్వారా తుఫాను వలన కలిగే నష్టాన్ని తగ్గించుకున్నారు

ఆర్.జి.ఎల్. - 2537 రకం వరిని సాగుచేయడం ద్వారా తుఫాను వలన కలిగే నష్టాన్ని తగ్గించుకున్నారు.

రైతు గురించి:

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27
Oct

అభివృద్దిపరచిన వరి రకాలను సాగుచేయడం

అభివృద్దిపరచిన వరి రకాలను సాగుచేయడం

రైతు గురించి:

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27
Oct

వ్యవసాయ యాంత్రీకరణ, వరి డ్రం సీడర్ వినియోగం

వ్యవసాయ యాంత్రీకరణ, వరి డ్రం సీడర్ వినియోగం

రైతు గురించి :

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27
Oct

పచ్చిరొట్ట ఎరువులతో చౌడునేలలను పునరుద్ధరించడం

పచ్చిరొట్ట ఎరువులతో చౌడునేలలను పునరుద్ధరించడం

రైతు గురించి :

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22
Oct

అధికోత్పత్తికి సుస్థిర, సేంద్రీయ పద్ధతిలో వరి సాగు

రైతు గురించి :

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22
Oct

వరిలో చీడ పురుగుల యాజమాన్యానికి కొత్త జీవకీటకనాశిని

రైతు గురించి: 

• రైతు పేరు: బచ్చు వీరా రెడ్డి

• ప్రదేశం: కరీం నగర్ జిల్లా, ఆంధ్ర ప్రదేశ్

• పుట్టిన తేదీ మరియు 31 జనవరి 2011 నాటికున్న వయస్సు: 15-3-1946, 64 సంవత్సరాల 9 నెలలు

• విద్యార్హతలు: పప్పు ధాన్యాలు బి.ఎస్సీ (ఎజి)

• సాగులో ఉన్న భూమి విస్తీర్ణం (హెక్టార్లలో): 41 సం.

• వరిసాగులో అనుభవం (సంవత్సరాలలో): 16 హె.

• రైతు అనుసరించిన పంటల సరళి : వరి - పప్పు ధాన్యాలు

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7
Oct

कृषि-जलवायु क्षेत्र

कृषि-जलवायु क्षेत्र
वर्षाजल, भू-भाग और मिट्टी के गुणों के आधार पर, आसाम को छ: कृषि जलवायु क्षेत्रों में निरूपित किया गया है:  
1. उत्तरी किनारे का समतल क्षेत्र (दरांग, सोनितपुर, लखीमपुर, धेमाजी जिला) राज्य के कुल क्षेत्रफल का 18.37 %  है।
2. ऊपरी ब्रह्मपुत्र धाटी क्षेत्र (गोलाघाट, जोरहट, शिवसागर, डिब्रूगढ़, तिनसुकिया जिला) राज्य के कुल क्षेत्रफल का 20.40 % है।
 3.

26
Sep

टिकाऊ चावल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रबंधन रणनीति

कुछ ऐसे अहम प्रबंधन कौशल, जो मृदा स्वास्थ्य को टिकाऊ बनाते हैं, निम्नांकित हैं:   

1. स्थान विशेष के आधार पर संतुलित रूप से उर्वरक का प्रयोग करना, ताकि नाइट्रोजन उर्वरक के विपरीत प्रभावों से बचा जा सके।  

2. मांग के आधार पर अजैविक/जैविक पोषण प्रबंधन को व्यवहार में लाना, जिनमें मौसम से पहले तथा उसके बाद हरे लेग्यूम/हरे खाद का उपयोग करना। 

3. चावल-चावल की बजाए चावल-गैर-चावल फ़सल का उपयोग करना, ताकि सही वातन हो सके और मृदा फेनॉल से भरपूर जैविक पदार्थ का अनावश्यक निर्माण से बचा जा सके। 

File Courtesy: 
DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
26
Sep

मृदा स्वास्थ्य के मापन तथा उसके प्रयोग में आने वाले व्यवधान

1. पूर्व चेतावनी वाले मृदा स्वास्थ्य संकेतकों की कमी।

2. मृदा स्वास्थ्य के भौतिक तथा जैविक आयामों के निर्धारण के लिए सरल तथा सटीक प्रोटोकॉल तथा उपकरणों की कमी। 

3. मृदा स्वास्थ्य के त्रिविम तथा सामयिक गुण की भिन्नता इसके मापन में कठिनाई पैदा करती है। 

4. किसानों की भाषा में मृदा स्वास्थ्य के लिए फ्रेम वर्क की कमी, जैसे कई सारे मृदा मापन की जगह पर कोई एकल उपयोगी इंडेक्स की कमी है।  

 

 

File Courtesy: 
DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
26
Sep

मृदा स्वास्थ्य की निगरानी

1. मृदा स्वास्थ्य की वास्तविक समय वाली निगरानी संभव नहीं,

पर उपयुक्त समयांतरालों में संकेतकों के मापन के जरिए इसकी निगरानी की जा सकती है, जो उनकी संवेदनशीलता पर निर्भर करती है और इसके लिए मानक विधियों का प्रयोग किया जाता है, जिनमें मृदा स्वास्थ्य में होने वाले परिवर्तनों को परखा जाता है, ताकि रक्षात्मक कदम उठाए जा सकें।  

File Courtesy: 
DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
26
Sep

मृदा स्वास्थ्य के लिए संकेतक

1. मृदा स्वास्थ्य के आसानी से मापे जाने हेतु संकेतक अहम होते हैं,

जिसके जरिए हम मृदा की गुणवता की निगरानी/मूल्यांकन करते हैं। 

2. संकेतकों को गुणात्मक (बोध, गंध, रूप-रंग) के जरिए तथा विश्लेष्णात्मक (रासायनिक, भौतिक तथा जैविक) तकनीकियों के जरिए मापा जाता है। 

3. निम्नांकित अहम रासायनिक, भौतिक तथा जैविक गुण हैं, जिनके जरिए व्यापक रूप से मृदा के स्वास्थ्य का निर्धारण किया जाता है।  

 

File Courtesy: 
DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
26
Sep

मृदा स्वास्थ्य में व्यवधान/गिरावट

1. मृदा स्वास्थ्य में कमी को निम्नीकरण करते हैं तथा यह मुख्य रूप से उपरिक्त तीन घटकों के कारण होता है, जो हैं- भौतिक निम्नीकरण (अपरदन, संरचना में गिरावट- पैन निर्माण/ संघनन, मृदा कैपिंग/क्रस्ट निर्माण), रासायनिक निम्नीकरण (पोषक तत्त्वों में कमी/लवणता/सॉडिफिकेशन/अम्लीकरण/रासायनिक प्रदूषण) तथा जैविक निम्नीकरण (जैविक पदार्थों की हानि, पोषण चक्र विधि का बाधित होना।)। 

2. वैश्विक स्तर पर पिछ्ले 50 सालों से होने काले मृदा निम्नीकरण को फसल भूमि का 13% माना गया है।  

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DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
26
Sep

मृदा की गुणवत्ता बनाम मृदा का स्वास्थ्य

1. वैज्ञानिक साहित्य में “मृदा गुणवत्ता” तथा “मृदा स्वास्थ्य” का काफी उपयोग होता है, जिसका अर्थ होता है बिना क्षीण हुए या पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना फ़सल की वृद्धि को बढ़ावा देना। 

2. कुछ लोग मृदा स्वास्थ्य जैसे शब्द का इस्तेमाल इसलिए करते हैं कि यह जीवित, गतिशील अवस्था वाली मानी जाती है, जो रेत, गाद और कीचड़ के कणों की बजाए काफी पोषक रूप में कार्य करती है।  

3. कुछ लोग मृदा गुणवत्ता शब्द का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि यह मृदा गुणों, जैसे भौतिक, रासायनिक तथा जैविक गुणों की भिन्नता को मापने पर जोर डालता है। 

 

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DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
26
Sep

चावल के टिकाऊ उत्पादन के लिए मृदा स्वास्थ्य की अवधारणा को समझना

1. चावल के टिकाऊ उत्पादन, टिकाऊ कृषि प्रणालियां तथा साथ ही भूमि उपयोग के लिए मृदा के मूल्यांकन तथा प्रबंधन के लिए मृदा स्वास्थ्य को समझना जरूरी होता है, ताकि वर्तमान में इसका आदर्श उपयोग हो सके तथा भविष्य के उपयोग के लिए उसकी गुणवत्ता में गिरावट न आ सके।  

2. कृषि में मृदा का महत्व है तथा इसे बनाए रखने का प्रयास किया जाना चाहिए। हालांकि हमने इसकी उत्पादकता की समस्या को काफी बढ़ा दिया है। 

3. इस प्रकार यह समझना जरूरी हो जाता है कि मृदा स्रोतों के अल्प कालिक उपयोग तथा इसके दीर्घ कालिक टिकाऊपन के बीच एक संतुलन कायम हो। 

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DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
26
Sep

फ़सल (चावल) के रोगों/पीड़कों पर सिलिकन (Si ) की भूमिका

1.Si की आपूर्ति बढ़ने से (बाढ़ की स्थिति में), पत्तियों की Si मात्रा भी बढ़ जाती है, जिससे राइस ब्लास्ट जैसे कवक रोगों के प्रति संवेदनशीलता में भी गिरावट आती है। 

2. हाइफी (उत्तकों का सिलिफिकेशन) के भेदन के ख़िलाफ एपिडर्मल कोशिकाओं में भौतिक अवरोध के निर्माण मुख्य विधि है, जिसके जरिए  Si राइस ब्लास्ट जैसे रोगों के प्रति प्रतिरोध पैदा करता है। इसके अलावा  Si  पौधों में घुलनशील  N की मात्रा को कम करता है, जिससे मिट्टी में चिटिनेज सक्रियता को प्रेरित होती है। 

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DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
26
Sep

फ़सल (चावल) के रोगों/पीड़कों पर बोरॉन (B) की भूमिका

1.B की आवश्यकता लिग्निन, सायनिडिंस (ल्युको साइनिडिन)/पॉलीफिनॉल के जैव-संश्लेषण के लिए होती है तथा इसके आदर्श प्रयोग से पौधों में कवक (मुर्झाना/रस्ट) तथा वायरल रोगों के ख़िलाफ प्रतिरोध बढ़ता है। 

2.B के सही उपयोग से पौधों में कीटों के प्रति प्रतिरोध में भी इज़ाफा होता है।  

 

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DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
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